कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

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नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ फरवरी २००८ से साभार

परिवर्तन के रास्ते और उसकी समस्याओं-चुनौतियों के बारे में कुछ बातें

[मजदूर वर्ग के एक राजनितिक अखबार की जरूरत के बारे में कुछ जरूरी बातें]

[कहाँ खड़ी है आज की दुनिया?]

[हमारा देश : नई समाजवादी क्रांति की मंज़िल में ]

[कहाँ खड़ा है देश का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन?

[नये सिरे से पार्टी निर्माण में अख़बार की भूमिका

[शुरुआत कहाँ से करें?]

[नई समाजवादी क्रांति के तूफ़ान को निमंत्रण दो!]

मजदूर वर्ग के एक राजनितिक अखबार की जरूरत के बारे में कुछ जरूरी बातें

इस अंक के साथ ‘बिगुल’ प्रकाशन के दसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. एक बेहद छोटी और अनुभवहीन टीम के साथ हमने इतिहास के इस कठिन अंधेरे दौर में अनचीन्हे रास्ते पर सफर शुरू किया था. अनुभव और टीम के अलग-अलग साथिओं की क्षमता की कमी को हमने अपने साझा संकल्प और ‘करते हुए सीखते जाने’ के विचार से भरपाई की और हम आगे बढ़ते रहे. इस कठिन और दुर्गम यात्रा पर हमारे हाथ-पाँव तो कई बार फूले लेकिन बोरिया-बिस्तर समेटने का ख्याल पल भर को भी मन में नहीं आया. ठहराव के मौकों पर देश की मेहनतकश जनता की मुक्ति का सपना हमारे दिलों को निराशा के अंधेरे में डूब जाने से बचाता रहा, पूँजी और लोभ-लाभ की दुनिया से नफरत हमें ताकत देती रही और मजदूर वर्ग के अतीत के महान संघर्षों की अग्निशिखाएं हमारी राहों को रोशन करती रही. एक दशक लंबे इस सफर के दौरान हमने अगर पीछे मुड़कर देखा भी  तो सिंहावलोकन की मुद्रा में-अपनी कमियों-कमजोरियों को जानने के लिए,जिससे आगे के सफर पर और अधिक मजबूती से कदम बढाये जा सकें. इस दौरान हम अपनी रफ्तार से कभी संतुष्ट नहीं रहे. ‘बिगुल’ के घोषित उद्देश्यों और जिम्मेंदारियों  का एक बेहद छोटा हिस्सा ही अब तक हम पूर कर सकें हैं. काफी कुछ किया जाना अभी बाकी है. जो बाकि है उसे पूरा करने के लिए हम कृतसंकल्प हैं क्योंकि हमें भरोसा है कि ‘बिगुल’ के जागरूक पाठकों की ताकत हमारे साथ खड़ी है. ‘बिगुल’ के प्रवेशांक में हमनें देश-दुनिया की वस्तुगत  परिस्थितियों और देश के क्रांतिकारी मजदूर आन्दोलन के हालात की ज़मीन पर खड़े होकर मजदूर वर्ग के अखिल भारतीय पैमाने के एक ऐसे राजनितिक अखबार की फौरी जरूरत के बारे में लिखा था जो सभी भारतीय भाषायों में एक साथ निकलता और कम से कम साप्ताहिक निकलता. उस समय अकेले अपने बूते ऐसा   अख़बार निकालना हमारे लिए सम्भव नहीं था. इसलिए हमने एक मासिक अख़बार से शुरुआत  की थी. उस समय अखिल भारतीय अख़बार एक ही सूरत में निकल सकता था जब देश के अधिकांश या कम से कम कुछ कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ग्रुपों, संगठनों की संयुक्त शक्ति इस काम को हाथ में लेती. लेकिन क्रांतिकारी संगठनों के बीच मौजूद जिन तमाम असूली और असली मतभेदों के चलते यह उस समय सम्भव नहीं था, वे आज भी न केवल बरक़रार हैं वरन अब तो यह संभावना लगभग ख़तम हो गई लगती  है.  नक्सलबाड़ी किसान उभार के चार दशक बाद  कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन के ठहराव-बिखराव की जो मौजूदा स्थिति  है उसे देखते हुए अब तो ऐसा नामुमकिन लग रहा है. हमने प्रवेशांक में लिखा था कि जितनी जल्दी हो सकेगा हम ‘बिगुल’ को दैनिक न सही तो कम से कम साप्ताहिक के स्तर तक ले आएंगे. हम इस लक्ष्य को अब तक हासिल नहीं कर सके हैं. लेकिन आज इसकी जरूरत हम पहले से भी काफी ज्यादा शिद्दत के साथ महसूस कर रहे हैं. एक दशक पहले ‘बिगुल’ प्रकाशन जब शुरू हुआ था तब देश में भूमंडलीकरण की नीतियों के नतीजे उतने खुले रूप में सामने नहीं आए थे. आज मजदूर वर्ग ही नहीं सभी मेहनतकश जमातें और यहाँ तक की मध्य वर्ग का बडा हिस्सा भी भूमंडलीकरण   की विनाशक ज़द में आ चुका है. एक तरफ़ मेहनत की दुनिया की घुटन बढती जा रही है दूसरी और मेहनत को हड़पने वाले परजीवियों  की दुनिया भोग-विलास और नैतिक अध:पतन के उस रसातल तक पहुँचती जा रही है जहाँ तक रोमन सभ्यता  भी नहीं पहुँची थी. क्या हमें इंतजार करते रहना चाहिए कि कोई विसूवियस जैसा ज्वालामुखी फ़िर से फूटे और पोम्पई शहर की तरह विलासियों की दुनिया को निगल जाए. हरगिज नहीं! जितना बड़ा सच यह है कि दुनिया बदलती है उतना बड़ा सच  यह भी है कि यह अपने आप नहीं बदलती. जिस तरह प्रकृति में किसी जड़ पिंड को गतिमान करने के लिए बाहरी बल की जरूरत होती है उसी तरह जड़ता और गतिरोध में पड़े समाज को गतिमान करने के लिए बाहर से बल लगाना पड़ता है. भूमंडलीकरण की नीतियों के खिलाफ दुनिया भर में यहाँ-वहां हो रहे छिटपुट जन विस्फोटों से, स्वत:स्फूर्त संघर्षों से विश्व पूंजीवाद के आततायी किले नहीं भहरा जायेंगे. यह भी नहीं होगा कि विश्व पूंजीवाद अपने तमाम असाध्य अंदरूनी अंतरविरोधों और ढांचागत  संकटों से अपने आप चरमराकर बैठ जाएगा. अतीत की तमाम मजदूर क्रांतियों का इतिहास भी यही बताता है कि दुनिया को संगठित नेतृत्व  वाली सुचेतन क्रांतियाँ ही बदल सकती हैं. और आज की पूंजीवादी दुनिया को केवल मार्क्सवादी विज्ञानं के मार्गदर्शन में काम करने वाली सर्वहारा वर्ग की क्रातिकारी पार्टी के नेतृत्व में संगठित जनसंघर्ष ही बदल सकते हैं. तभी एक नई दुनिया के बंद दरवाजे खुलेंगे. और सर्वहारा  वर्ग की ऐसी सही-सच्ची क्रातिकारी पार्टी का निर्माण एवं गठन करने के लिए जरूरी है मजदूर वर्ग का एक क्रान्तिकारी राजनितिक अख़बार! ऐसे अख़बार के बारे में हमारा यह  अहसास देश और दुनिया की वस्तुगत परिस्थितियों के साथ ही देश की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की मौजूदा स्थिति के ठोस, वैज्ञानिक आकलन पर खड़ा है.

कहाँ खड़ी है आज की दुनिया?

भविष्य के प्रति आशावादी होना चाहिए लेकिन उसकी इमारत ठोस जमीन पर खड़ी होनी चाहिए. क्रांतिकारी जब भविष्य के अपने मंसूबे बाँधता है तो अपने मन की चाहतों को वह सच्चाइयों पर थोपता नहीं. शुरुआत वह सच्चाइयों का साहसपूर्वक सामना करने से ही करता है. और आज की कड़वी सच्चाई यह है कि शोषण-दमन और प्रतिरोध की ताकतें पिछले एक दशक में भी प्रतिरोध की ताकतों पर हावी रही हैं. पूंजीवादी शोषण-दमन का तंत्र और अधिक संगठित हुआ है, जबकि प्रतिरोध आज भी असंगठित है, गतिरोध और निराशा का माहौल है. विश्व ऐतिहासिक स्तर पर सर्वहारा वर्ग और समाजवादी क्रांतियों  की पराजय के बाद, विश्व-शक्ति-संतुलन विगत लगभग तीन दशकों से पूंजीवाद के पक्ष में बना हुआ है. फ़िर भी अगर वस्तुगत परिस्थितियों  की बात की जाए तो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी नई सर्वहारा क्रांतियों की सर्वाधिक उर्वर  और सम्भावनासम्पन्न ज़मीन  एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका के उन पिछडे पूंजीवादी देशों में है जहाँ प्राक्पूंजीवादी उत्पादन-सम्बन्ध मूलत: और   मुख्यत: टूट चुके हैं और अवशेष-मात्र के रूप में मौजूद हैं, जहाँ पूंजीवादी उत्पादन-सम्बन्ध का वर्चस्व स्थापित हो चुका है, वहां की अर्थव्यवस्था विविधिकृत है, जहाँ बुनियादी एवं अवरचनागत उद्योगों  सहित औद्योगिक उत्पादन का भारी विकास हुआ है तथा औद्योगिक सर्वहारा वर्ग की भारी आबादी अस्तित्व में आ चुकी है, जहाँ गावों में पूँजी की व्यापक पैठ के साथ ही ग्रामीण सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा आबादी की भी एक भारी संख्या पैदा हो चुकी है, जहाँ पूंजीवादी सामाजिक-सांस्कृतिक तंत्र के विकास के चलते सर्वहारा क्रांति के सहयोगी शिक्षित निम्न मध्यवर्ग और क्रांतिकारी बुद्धिजीवी समुदाय का प्रचुर विकास हुआ है तथा जहाँ कुशल मजदूरों एवं तकनीशियनों-वैज्ञानिकों के साथ ही विज्ञानं-तकनोलोजी  के स्वतन्त्र विकास के लिए जरूरी मानव-उत्पादन मौजूद है. ऐसे अगली कतार के क्रांतिकारी सम्भावनासम्पन्न  देशों में ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स आदि के साथ ही भारत भी शामिल है. (चीन,पूर्व सोवियत संघ के घटक देशों और कुछ पूर्वी यूरोपीय देशों में भी नई क्रांतियों की परिस्थितियाँ तेजी से तैयार हो रही हैं, जहाँ की जनता कभी समाजवादी क्रांति के प्रयोगों, परिणामों को देख चुकी है, पर इन देशों की स्थिति कुछ भिन्न है जो अलग से चर्चा का विषय है). समस्या यह है कि तीसरी दुनिया के जिन देशों में ज़मीन तैयार है या हो रही है,वहां क्रांतिकारी कम्युनिस्ट शक्तियां बिखरी हुई हैं. वे देश स्तर की एक  पार्टी के रूप में संगठित नहीं हैं और व्यापक जनता के बीच उनका आधार भी देशव्यापी नहीं है. इसका एक वस्तुगत  कारण यह जरूर है कि सर्वहारा वर्ग  और पूंजीपति वर्ग के बीच जारी विश्व ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की समाप्ति और इसके दूसरे, निर्णायक चक्र की शुरूआत के बीच अन्तराल में, प्रतिक्रिया की सभी शक्तियों ने क्रांतिकारी शक्तियों को पीछे धकेलने-कुचलने के लिए अपनी सारी शक्ति झोंक दी है. अतीत की क्रांतियों का शासक वर्गों ने भी समाहार किया है. हर देश की पूंजीवादी राज्यसता अपने सामाजिक-अवलम्बों के विकास के लिए पहले की अपेक्षा बहुत अधिक कुशलता से काम कर रही हैं और इसमें साम्राज्यवादी देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी भरपूर सहायता मिल रही है. साथ ही आज सिनेमा, टीवी और  प्रिंट-मिडीया सहित समस्त संचार माध्यमों का अभूतपूर्व प्रभावी  इस्तेमाल पूंजीवादी संस्कृति एवं विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए, व्यापक जन समुदाय की दिमागी गुलामी को लगातार खाद-पानी देने के लिए तथा कम्युनिज्म, विगित सर्वहारा  क्रांतियों, उनके नेताओं  और समाजवादी  प्रयोगों के बारे में भांति-भांति के सफ़ेद झूठों का प्रचार करके उन्हें कलंकित-लांछित करने के लिए, विश्व स्तर पर किया जा रहा है. इस ऐतिहासिक अन्तराल की वस्तुगत स्थिति का एक अहम पहलू यह भी है कि इसी दौरान विश्व पूंजीवाद की संरचना एवं कार्य-प्रणाली में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जिन्हें समझे बिना इक्कीसवीं शताब्दी की नयी सर्वहारा क्रांतियों की रणनीति एवं आम रणकौशल की कोई समझ बनाई ही नहीं जा सकती. इन वैश्विक बदलावों को समझकर विश्व सर्वहारा क्रांति की नयी आम दिशा निर्धारत करने के लिए न तो विश्व सर्वहारा का मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-माओ जैसा कोई मान्य नेतृत्व है, न ही सोवियत संघ और चीन जैसा कोई समाजवादी देश और वहां की अनुभवी पार्टियों जैसी कोई पार्टी है और न ही इन्टरनेशनल जैसा दुनिया भर की पार्टियों का कोई अंतरराष्ट्रीय मंच है.  ऐसी स्थिति में विश्व पूंजीवाद की कार्यप्रणाली में, और साथ ही दुनिया  के अधिकांश क्रांतिकारी सम्भावनासम्पन्न देशों की राज्यसत्ताओं  एवं सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं में आये बदलावों को जान-समझकर क्रांति की मंजिल और मार्ग को जानने-समझाने का काम इन देशों के छोटे-छोटे ग्रुपों-संगठनों में बनते-बिखरते  कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठनो को ही करना है. जो कम्युनिस्ट पार्टियाँ संशोधनवादी होकर संसद-मार्ग का राही बन चुकी हैं, वे क्रांति-मार्ग पर कदापि वापस नहीं लौट सकती. वे पतित होकर बुर्जुआ पार्टियाँ बन चुकी हैं, जिनका काम समाजवाद का मुखौटा लगाकर मेहनतकश जनता को धोखा देना है और पूंजीवाद व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति की भूमिका निभानी है. विपरीततम   वस्तुगत स्थितियों से जूझकर अक्तूबर क्रांतिकारी ताकतें ही कर सकती हैं जो शांतिपूर्ण  संक्रमण के हर सिद्धांत का और संशोधनवाद के हर रूप का विरोध करती हैं, जो वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकवाद के सिद्धांत का और संशोधनवाद के हर रूप का विरोध करती हैं,जो वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकत्व के सिद्धांत को, बुर्जुआ राज्यसता को बलपूर्वक चकनाचूर करके सर्वहारा राज्यसता की स्थापना के सिद्धांत को तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के लिए समाजवादी समाज में सर्वहारा वर्ग को सर्वोतोमुखी अधिनायाकतत्व के अंतर्गत नए-पुराने बुर्जुआ तत्वों, बुर्जुआ अधिकारों और बुर्जुआ विचारों के विरूद्ध सतत् वर्ग संघर्ष चलाने के उस सिद्धांत को स्वीकार करती हैं जो माओ के नेतृत्व में चीन में सर्वहारा सांस्कृतिक-क्रांति (1966-76) के दौरान प्रतिपादित किया गया. लेकिन कम्युनिज्म के इन क्रांतिकारी सिद्धांतों को स्वीकारने वाले कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन अपनी तमाम ईमानदारी, बहादुरी और कुर्बानी के बावजूद और दुनिया के अधिकांश देशों में अपनी सक्रीय मौजूदगी के बावजूद, फिलहाल विचारधारात्मक रूप से काफी कमज़ोर हैं. माओ के महान अवदानों को वैज्ञानिक भाव के बजाय वे भक्ति भाव से स्वीकार करते हैं. इसी कठमुल्लावाद के चलते वे क्रांति के कार्यक्रम  के प्रश्न को भी प्राय: विचारधारा का प्रश्न बना देते हैं और माओ के विचारधारात्मक अवदानों को स्वीकारते हुए इस सीमा तक चले जाते हैं कि ऐसा मानने लगते हैं कि चूंकि माओ और चीन की पार्टी ने अपने समय में तीसरी  दुनिया के देशों में साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी नवजनवादी क्रांति की बात कही थी, इसलिए हमें वैसा ही करना होगा. इससे अलग सोचना ही वे मार्क्सवाद से विचलन मानते हैं. ये कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन जीवन की ठोस सच्चाई  को सिद्धांतों के सांचे में फिट करने की कोशिश करते रहते हैं. यही कठमुल्लावाद है. इसी कठमुल्लावाद के चलते, साम्राज्यवाद की बुनियादी प्रकृति को समझकर आज उसकी कार्य प्रणाली एवं संरचना में आए बदलावों को समझने की बजाय अधिकांश कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन साम्राज्यवाद  को हूबहू वैसा ही देखना चाहते हैं जैसा वह लेनिन के समय में था. वे राष्ट्रीय-औपनिवेशिक प्रश्न की समाप्ति के यथार्थ को, परजीवी, अनुत्पादक वित्तीय पूँजी के भारी विस्तार एवं निर्णायक वर्चस्व के यथार्थ को, राष्ट्र्पारीय निगमों के बदलते चरित्र एवं कार्यप्रणाली और वित्तीय पूँजी के भूमंडलीकरण के यथार्थ को, पूंजीवादी उत्पादन-पद्धति में आए अहम बदलावों के यथार्थ को, भूतपूर्व उपनिवेशों में प्राक् पूंजीवादी संबंधो की बजाय पूंजीवादी-उत्पादन-संबंधो की प्रधानता तथा क्रांति के रणनीतिक संश्रय  ( वर्गों के संयुक्त मोर्चे) में परिवर्तन के यथार्थ को समझने की कोशिश करने की बजाय उनकी अनदेखी करते हैं. ऐसे में उनके क्रांतिकारी सामाजिक प्रयोग मजदूर  वर्ग और सर्वहारा क्रांति के अन्य मित्र वर्गों को लामबंद करने के बजाय प्राय:  लकीर की फकीरी  और रूटीनी कवायद बनकर रह जाते हैं और कभी-कभी तो शासक वर्गों का कोई हिस्सा अपने आपसी संघर्षों में उनका इस्तेमाल भी कर लेता है. इस कठमुल्लावाद के चलते सामाजिक प्रयोगों की विफलता ने एक लंबे गतिरोध और व्यापक मेहनतकश जनता से अलगाव की स्थिति पैदा की है. इस स्थिति में, दुनिया के सभी अग्रणी क्रांतिकारी सम्भावना वाले देशों में न केवल देश स्तर की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी के गठन का काम लंबित पड़ा हुआ है, बल्कि कठमुल्लावाद और गतिरोध की लम्बी अवधि दक्षिणपंथी  और “वामपंथी” अवसरवाद के विचारधारात्मक विचलनों को जन्म दे रही है. ने.क. पा. (माओवादी) के नेतृत्व में विजयोंमुख  जनवादी क्रांति का उदाहरण देते हुए दुनिया के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर में हावी कठमुल्लावादी सोच जोर-शोर से यह साबित करने की कोशिश करती है कि अभी भी तीसरी दुनिया के देशों में नवजनवादी क्रांति की धारा ही विश्व सर्वहारा क्रांति की मुख्य धारा और मुख्य कड़ी बनी हुई है. हम नेपाल के माओवादी क्रांतिकारियों को (कुछ अहम विचारधारात्मक  मतभेदों, आपत्तियों एवं आशंकाओं के बावजूद) हार्दिक इंकलाबी सलामी देते हैं, लेकिन साथ ही,विनम्रतापूर्वक यह कहना चाहते हैं कि नेपाल की विजयोंमुख  क्रांति इक्कीसवीं सदी में होने वाली बीसवीं सदी की क्रांति है. यह इतिहास का एक ‘बैकलागहै. यह इक्कीसवीं सदी की प्रवृत्ति-निर्धारक  व मार्ग-निरूपक क्रांति नहीं  है. नेपाल दुनिया के उन थोड़े से पिछडे  देशों में से एक है, जहाँ बहुत कम औद्योगिक विकास  हुआ है और जहाँ प्राक् पूंजीवादी भूमि, सम्बन्ध मुख्यत: मौजूद है. भारत, ब्राजील, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका आदि की ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों की स्थिति भी नेपाल से काफी भिन्न है. आज तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों में प्राक् पूंजीवादी भूमि सम्बन्ध मूलत: और  मुख्यत: नष्ट हो चुके हैं. वहां पूंजीवादी विकास मुख्य प्रवृति बन चुकी है. इन देशों का पूंजीपति वर्ग सत्तासीन होने के बाद साम्राज्यवादी देशों के पूंजीपतियों   का कनिष्ट साझेदार बन चुका है. इन देशों की बुर्जुआ राज्यसत्तायें देशी पूंजीपति  वर्ग के साथ ही साम्राज्यवादी शोषण का भी उपकरण बनी हुई हैं. इन देशों में साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी, नयी समाजवादी क्रांति की स्थिति उत्पन्न हुई है और ऐसा विश्व पूंजीवाद के इतिहास के नए दौर की एक नई विशिष्टता है. इस नई ऐतिहासिक परिघटना की अनदेखी आज दुनिया के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर की मुख्य समस्या है. जब तक यह समस्या हल नहीं होगी, तब तक विश्व सर्वहारा क्रांति की नई लहर आगे की ओर गतिमान नहीं हो सकती.

हमारा देश : नई समाजवादी क्रांति की मंज़िल में

भारत का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन यदि विचारधारात्मक कमज़ोरी और  अधकचरेपन का शिकार नहीं होता तो भारतीय समाज के पूंजीवादी  रूपांतरण की  प्रक्रिया  को गत शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में ही समझकर समाजवादी क्रांति के कार्यक्रम के नतीज़े तक पहुँच सकता था. और अब तो भारतीय समाज का पूंजीवादी चरित्र इतना स्पष्ट हो चुका है कि कठमुल्लेपन से मुक्त कोई नौसिखुआ मार्क्सवादी भी इसे देख समझ सकता है. गांवों  के छोटे और मंझोले किसान आज अपनी ज़मीन के मालिक ख़ुद हैं और सामंती लगान और उत्पीडन नहीं, बल्कि पूँजी की मार उनको लगातार जगह-ज़मीन से उजाड़कर दर-ब-दर कर रही है. किसान आबादी के विभेदीकरण और सर्वहारा की प्रक्रिया एकदम स्पष्ट है. सालाना लाखों छोटे और निम्न मध्यम किसान उजड़कर सर्वहारा की कतारों में शामिल हो रहे हैं. धनी और उच्च मध्यम किसान बाज़ार के लिए पैदा कर रहे हैं और खेतों में भाड़े के मजदूर लगाकर अधिशेष निचोड़ रहे हैं. गांवों में अनेकश: नए रास्तों और तरीकों से वित्तीय पूँजी की पैठ बढ़ी है और देश के सुदूरवर्ती हिस्से भी एक राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी  के भीतर आ गए हैं. गाँव के धनी और खुशहाल मध्यम किसान आज क्रांतिकारी भूमि-सुधार के लिए नहीं बल्कि निचोड़े जाने वाले अधिशेष में अपनी भागीदारी बढ़ाने को लेकर आन्दोलन करते हैं. कृषि-लागत कम करने और कृषि-उत्पादों के लाभकारी मूल्यों की मांग की यही अंतर्वस्तु है, इसे मार्क्सवादी अर्थशास्त्र का एक सामान्य विद्यार्थी  भी समझ सकता है. देश के पुराने औद्योगिक केन्द्रों को पीछे छोड़ते हुए आज सुदूरवर्ती कोनों तक लाखों की आबादी वाले नए-नए औद्योगिक केन्द्र विकसित हो गए हैं. यातायात-संचार के साधनों का विगत तीन दशकों के दौरान अभूतपूर्व तीव्र गति से विकास हुआ है. ऑंखें  खोल देने के लिए मात्र यह एक तथ्य ही काफ़ी है की पूरे देश के संगठित-असंगठित, ग्रामीण व शहरी सर्वहारा की आबादी आज पचास करोड़ के आसपास पहुँच रही है और इसमे यदि अर्धसर्वहारा की आबादी भी जोड़ दी जाए तो यह संख्या कुल आबादी के आधे को भी पार कर जायेगी. यह किसी प्राकृतिक अर्थव्यवस्था या अर्द्धसामंती उत्पादन संबंधो के दायरे में कत्तई संभव नहीं हो सकता था. आज का भारत न केवल क्रांतिपूर्व चीन से सर्वथा भिन्न है, बल्कि वह 1917  के रूस से भी कई गुना अधिक पूंजीवादी है. आज के भारत में केवल पूंजीवाद-विरोधी समाजवादी क्रांति की बात ही सोची जा सकती हैं. जहाँ तक साम्राज्यवाद का प्रश्न है, भारत जैसे सभी उत्तर औपनिवेशिक, पिछडे पूंजीवादी देश साम्राज्यवादी शोषण और लूट के शिकार हैं. हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में ही जी रहे हैं, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रकृति आज उपनिवेशों और नवउपनिवेशों के दौर से सर्वथा भिन्न है. भारतीय पूंजीवादी वर्ग आज देशी बाज़ार पर अपना निर्णायक वर्चस्व स्थापित करने के लिए राज्यसत्ता पर कब्ज़ा की लडाई नहीं लड़ रहा है. राज्यसत्ता पर तो वह 1947 से ही  काबिज़ है. अब उसकी मुख्य लडाई देश की मेहनतकश आबादी और आम जनता के विरुद्ध है लेकिन उद्योगों  और बाज़ार के विकास के लिए उसे पूँजी और तकनोलोजी, तेल व अन्य ज़रूरतों के लिए विश्व बाज़ार की भी ज़रूरत है. यह ज़रूरत भी उसे विश्व बाज़ार के चौधरियों के आगे झुकने के लिए मज़बूर करती है. अपनी इन ज़रूरतों और विवशताओं के चलते भारतीय पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवाद के सामने घुटने टेककर समझौते करता है और उनके साथ मिलकर भारतीय जनता का शोषण करता है. ऐसा करते हुए वह साम्राज्यवादियों  से निचोड़े गए कुल अधिशेष में अपनी भागीदारी बढ़ाने को लेकर मोलतोल भी करता है और दबाब भी बनाता है, लेकिन उसकी यह लड़ाई राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई नहीं बल्कि बड़े लूटेरों से अपना हिस्सा बढ़ाने की छोटे लूटेरे की लड़ाई मात्र है. अपनी इसी लड़ाई में भारतीय पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवादी लूटेरों की आपसी होड़ का भी यथासंभव लाभ उठाने की कोशिश करता है. आजादी के बाद के तीन दशकों तक, जनता से पाई-पाई निचोड़कर समाजवाद के नाम पर  राजकीय पूंजीवाद का ढांचा खड़ा करके उसने साम्राज्यवादी दबाब का एक हद तक मुकाबला किया, लेकिन देशी पूँजी की ताकत बढ़ने के साथ ही, निजीकरण की प्रक्रिया की शुरूआत हुई और फ़िर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में अलग-अलग पूंजीपतियों  ने विदेशी कंपनियों से पूँजी और तकनोलाजी लेने के लिए सरकार पर दबाब बनाना शुरू किया. इसके चलते उदारीकरण  की प्रक्रिया तेज हुई. निजीकरण-उदारीकरण के इस नए दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था पर साम्राज्यवादी पूँजी का दबाब बहुत अधिक बढ़ा है लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं कि उपनिवेशवाद की वापसी हो रही है. ऐसा सोचना भारतीय पूंजीपति वर्ग की स्थिति को नहीं समझ पाने का नतीज़ा है. भारतीय पूंजीपति वर्ग विश्व पैमाने के अधिशेष विनियोजन में साम्राज्यवादी शक्तियों के कनिष्ट साझीदारों की पंगत में बैठकर इस देश की राज्यसत्ता पर काबिज़ बना हुआ है और उसकी राज्यसत्ता साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए वचनवद्ध है. साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए पूंजीवाद का कोई भी हिस्सा अब जनता के अन्य वर्गों का रणनीतिक सहयोगी नहीं बन सकता. यानि साम्राज्यवाद-विरोध का प्रश्न आज राष्ट्रीय मुक्ति का प्रश्न न रहकर  देशी पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्यसत्ता के विरुद्ध संघर्ष का ही एक अविभाज्य अंग बन गया है. भारत जैसे भूतपूर्व उपनिवेशों में आज एक सर्वथा नए प्रकार की समाजवादी क्रांति की-साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी क्रांति की स्थिति प्रकट हुई है. इस नए स्थिति को समझे बिना भारतीय जनता की मुक्ति के उपक्रम को एक कदम भी आगे नहीं बढाया जा सकता.

कहाँ खड़ा है देश का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन?

लेकिन ऐसा करने की बजाय, भारत के अधिकांश कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन आज कर क्या रहे हैं? कुछ तो ऐसे छोटे-छोटे संगठन हैं जो कोई भी व्यवहारिक कार्रवाई करने की बजाय साल भर में मुखपत्र के एकाध-अंक निकालकर और कुछ संगोष्ठी-सम्मलेन करके बस अपने जिंदा होने का प्रमाण पेश करते रहते हैं. उनकी तो चर्चा करनी ही बेकार है. कुछ ऐसे हैं जो देश की पचास करोड़ आबादी को छोड़कर मालिक किसानो की लागत मूल्य कम करने और लाभकारी मूल्य तय करने की मांग को लेकर आंदोलनों में लगे रहते हैं और व्यवहारत: सर्वहारा वर्ग के हितों पर कुठारघात करते हुए, छोटे और मंझोले मालिक किसानों के आंदोलनों का पुछल्ला  बनकर नरोदवाद के विकृत भारतीय संस्करण प्रस्तुत करते रहते हैं. वे लोग वस्तुत: कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नहीं बल्कि “मार्क्सवादी नरोदवादी” हैं. कृषि और कृषि से जुड़े उद्योगों की भारी ग्रामीण सर्वहारा आबादी को संगठित करने तथा राजनितिक प्रचार एवं आन्दोलन के द्वारा गाँव के गरीबों व छोटे किसानों को समाजवाद के झंडे तले इकठ्ठा करने की कोशिश कोई संगठन नहीं कर रहा. इसकी बजाय, यहाँ-वहां, सर्वोदवियों की तरह, भूमिहीनों के बीच पट्टा-वितरण जैसी मांग उठाकर कुछ संगठन ग्रामीण सर्वहारा में ज़मीन के निजी मालिकाने की भूख पैदा करके उन्हें समाजवाद के झंडे के खिलाफ़ खड़ा करने का प्रतिगामी काम ही कर रहे हैं. औद्योगिक सर्वहारा के बीच किसी भी मा. ले. संगठन की कोई प्रभावी पैठ-पकड़ आजतक नहीं बन पाई है. कुछ संगठन औद्योगिक सर्वहारा वर्ग में काम करने के नाम पर केवल मजदूर वर्ग  के कारखाना-केंद्रित आर्थिक संघर्षों तक ही अपने को सिमित रखे हुए  हैं और अर्थवाद-ट्रेडयूनियनवाद  की घिनौनी बानगी पेश कर रहे हैं. मजदूर वर्ग के बीच राजनितिक प्रचार कार्य, उनके बीच से पार्टी-भरती और राजनितिक मांगों के इर्द-गिर्द व्यापक  मज़दूर आबादी को लामबंद करने का काम उनके एजेंडे पर है ही नहीं. मज़दूर वर्ग के बीच जन-कार्य और पार्टी कार्य विषयक लेनिन की शिक्षाओं के एकदम उलट, ये संगठन मेंशेविकों से भी कई गुना अधिक घटिया सामाजिक जनवादी आचरण कर रहे हैं. भारतीय क्रांति के कार्यक्रम की ग़लत समझ के कारण, भारत का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन शासक वर्गों की आपसी मोल-तोल में, वस्तुगत तौर पर, बटखरे के रूप में इस्तेमाल हो रहा है. जब कुछ कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन जोर-शोर से कृषि-लागत कम करने और लाभकारी मूल्य की लड़ाई लड़ते हैं तो पूंजीपति वर्ग के साथ मोल-तोल में धनी किसानों के हाथों बटखरे के रूप  में इस्तेमाल हो जाते हैं. जब वे साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए राष्ट्रीय मुक्ति का नारा देते हैं तो साम्राज्यवादियों और भारतीय  पूंजीपतियों के बटखरे के रूप में इस्तेमाल हो जाते हैं. कुछ संगठन किताबी फार्मूले की तरह समाजवादी क्रांति के कार्यक्रम को स्वीकार करते हैं, लेकिन इनमे से कुछ अपनी गैर बोल्शेविक सांगठनिक कार्यशैली के कारण जनदिशा को लागू कर पाने में पूरी तरह से विफल रहे हैं और निष्क्रिय उग्रपरिवर्तनवाद  का शिकार होकर आज एक मठ या  संप्रदाय में तब्दील हो चुके हैं. दुसरे कुछ ऐसे हैं जो मज़दूर वर्ग में काम करने के नाम पर केवल अर्थवादी और लोकरंजकतावादी आन्दोलनपंथी  कवायद करते रहते हैं. भूमि-प्रश्न पर इनकी समझ के दिवालियेपन का आलम  यह है  कि कृषि के लागत मूल्य को घटाने की मांग को ये समाजवादी क्रांति के कार्यक्रम की एक रणनीतिक मांग मानते हैं.

अपने आप को माओवादी कहने वाले जो “वामपंथी” दुस्साहसवादी  देश के सुदूर आदिवासी अंचलों में निहायत पिछडी चेतना वाली जनता के बीच “मुक्तक्षेत्र” बनाने का दावा करते हैं और लाल सेना की सशस्त्र कार्रवाई के नाम पर कुछ आतंकवादी कार्रवाईयां करते रहते हैं. वे भी देश के अन्य विकसित हिस्सों में पूरी तरह से “मार्क्सवादी” नरोदवादी आचरण करते हुए मालिक किसानों की लागत मूल्य-लाभकारी मूल्य की मांगों पर छिटपुट आन्दोलन करते रहते हैं और यहाँ-वहां कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों के बीच काम के नाम पर जुझारू अर्थवाद की विकृत बानगी प्रस्तुत करते रहते हैं.

निचोड़ के तौर  पर कहा जा सकता है कि तीन दशकों से भी अधिक समय से, एक ग़लत कार्यक्रम पर अमल की आधी-अधूरी कोशिशों और एक गैर बोल्वेशिक सांगठनिक कार्यशैली पर अमल ने भारत के अधिकांश कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठनों के पहले से ही कमजोर विचारधारात्मक आधार को लगातार ज्यादा से ज्यादा कमज़ोर बनाया है और उनके भटकावों को क्रांतिकारी चरित्र के क्षरण-विघटन के मुकाम तक ला पहुँचाया है. अधिकांश संगठनो के नेतृत्व  राजनितिक अवसरवाद का शिकार हैं. वे सर्व भारतीय पार्टी खड़ी करने के प्रश्न पर संजीदा नहीं है और बौद्ध-भिक्षुओं की तरह रूटीनी कामों का घंटा बजाते हुए वक्त काट रहे हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो वे जरूर सोचते कि छत्तीस वर्षों से जारी ठहराव और विखराव के कारण सर्वथा बुनियादी हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो जूते के हिसाब से पैर काटने की बजाय वे भारतीय समाज के पूंजीवादी रूपांतरण  का अध्ययन करके कार्यक्रम के प्रश्न पर सही नतीज़े पर पहुँचने  की कोशिश ज़रूर करते और कठदलीली  या उपेक्षा का रवैया अपनाने के बजाय समाजवादी क्रांति की मंज़िल के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों पर संजीदगी से विचार ज़रूर करते. बहरहाल, केन्द्रीय प्रश्न कार्यक्रम के प्रश्न पर मतभेद का रह ही नहीं गया है. अब मूल प्रश्न विचारधारा का हो गया है. ज्यादातर संगठनों ने बोल्शेविक सांगठनिक असूलों और कार्यप्रणाली को तिलांजलि दे दी है, उनका आचरण एकदम खुली सामाजिक जनवादी पार्टियों जैसा ही है तथा पेशेवर क्रांतिकारी या पार्टी सदस्य के उनके पैमाने बेहद ढीले-ढाले  हैं. यदि कोई संगठन विचारधारात्मक कमजोरी के कारण लंबे समय तक सर्वहारा वर्ग के बीच काम ही नहीं करेगा, या फ़िर लंबे समय तक अर्थवादी ढंग से काम करेगा तो कालांतर में विच्युति भटकाव का और फ़िर भटकाव विचारधारा से प्रस्थान का रूप ले ही लेगा और वह संगठन लाज़िमी तौर पर संशोधनवाद के गढे में जा गिरेगा. यदि कोई संगठन कार्यक्रम की अपनी गलत समझ के कारण लंबे समय तक मालिक किसानों की मांगो के लिए लड़ता हुआ परोक्षत: सर्वहारा वर्ग के हितों के विरुद्ध खड़ा होता रहेगा तो कालांतर में वह एक ऐसा नरोदवादी बन ही जाएगा, जिसके ऊपर बस एक मार्क्सवादी का लेबल भर चिपका होगा. यानि, विचारधारात्मक कमजोरी के चलते भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी भारतीय  क्रांति के कार्यक्रम की सही समझ तक नहीं पहुंच सके और अब, लंबे समय तक गलत कार्यक्रम के आधार पर राजनितिक व्यवहार ने उन्हें विचारधारा का ही परित्याग करने के मुकाम तक ला पहुँचाया है. किसी भी यथार्थवादी व्यक्ति को अब इस खोखली आशा का परित्याग कर देना चाहिए कि मा. ले.  शिविर के घटक संगठनों के बीच राजनितिक वाद-विवाद  और अनुभवों के आदान-प्रदान के आधार पर एकता कायम हो जायेगी और सर्वहारा वर्ग की सर्वभारतीय क्रांतिकारी  पार्टी अस्तित्व में आ जायेगी. जो छत्तीस वर्षो में नहीं हो सका वह अब नहीं हो सकता. यदि होना ही होता तो गत शताब्दी के सातवें या आठवें दशक तक ही हो गया होता. अब कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर  की इन संरचनाओं  को यदि किसी चमत्कार से मिला भी दिया जाए तो देश स्तर की एक बोल्शेविक पार्टी की संरचना नहीं बल्कि एक ढीली-ढाली मेन्शेविक पार्टी जैसी  संरचना ही तैयार होगी. और सबसे प्रमुख बात तो यह है कि इन संगठनों के अवसरवादी नेतृत्व से अब यह उम्मीद पालना ही व्यर्थ है. जहाँ तक जुनूनी आतंकवादी धारा की बात है तो उनकी दुस्साहसवादी रणनीति दुर्गम जंगल-पहाडों और बेहद पिछड़े क्षेत्रों में वे कुलकों की मांग उठाते हुए नरोदवादी अमल करते रहेंगे, मजदूरों के बीच अर्थवाद करते रहेंगे और शहरों में बुद्धिजीवियों का तुष्टिकरण करते हुए उनका दुमछल्ला बनकर सामाजिक जनवादी आचरण करते रहेंगे. इस सतमेल खिचड़ी की  हांडी बहुत  देर आंच पर चढी नहीं रह सकती. कालांतर में, इस धारा का विघटन अवश्यम्भावी है. इससे छिटकी कुछ धाराएँ भा.क.पा. (मा.ले.) (लिबरेशन) की ही तरह सीधे संशोधनवाद का रास्ता पकड़ सकती हैं और मुमकिन है कि कोई एक या कुछ धडे “वामपंथी” दुस्साहसवाद के परचम को उठाये हुए इस या उस सुदूर कोने में अपना अस्तित्व बनाये रखें या फ़िर शहरी आतंकवाद का रास्ता पकड लें. भारत में पूंजीवादी विकास जिस बर्बरता के साथ मध्यवर्ग के निचले हिस्सों को भी पीस और निचोड़ रहा है, उसके चलते,खासकर निम्न मध्यवर्ग से, विद्रोही युवाओं का एक हिस्सा आत्मघाती उतावलेपन के साथ,व्यापक मेहनतकश जनता को जाग्रत व लामबंद किए बिना, स्वयं अपने साहस और आतंक एवं षड्यंत्र की रणनीति के सहारे आनन-फानन में क्रांति कर देने के लिए मैदान में उतरता रहेगा. निम्न पूंजीवादी क्रांतिकारी की यह प्रवृत्ति लैटिन अमेरिका से लेकर यूरोप तक के पिछड़े पूंजीवादी देशों में एक आम प्रवृति के रूप में मौजूद है. विश्व सर्वहारा आन्दोलन के उदभव से लेकर युवावस्था तक, यूरोप में (और रूस में भी) कम्युनिस्ट धारा की पूर्ववर्ती एवं सहवर्ती धारा के रूप में निम्नपूंजीवादी  क्रांतिवाद की यह प्रवृत्ति मौजूद थी और मजदूरों के एक अच्छे-खास हिस्से पर इनका भी प्रभाव मौजूद था. आश्चर्य नहीं है कि आने वाले दिनों में भारत में भी क्रांतिकारी मज़दूर आन्दोलन के साथ-साथ मध्यवर्गी क्रांतिवाद की एक या विविध धाराएं मौजूद रहें और (कोलम्बिया या अन्य कई लातीन अमेरिकी देशों के सशस्त्र ग्रुपों की तरह) उनमें से कई अपने को मार्क्सवादी या माओवादी भी कहते रहें. लेकिन समय बीतने के साथ ही मार्क्सवाद के साथ उनका दूर का रिश्ता भी बना नहीं रह पायेगा. जहाँ तक कतारों की बात है, यह सही है कि आज भी क्रांतिकारी कतारें मुख्यत: मा.ले. संगठनो के तहद ही संगठित हैं. पर गैर बोल्शेविक ढांचों वाले मा.ले. संगठनों में उन्हें मार्क्सवादी विज्ञान से शिक्षित नहीं  किया गया है और स्वतन्त्र पहलकदमी के साहस व निर्णय लेने की क्षमता का भी उनमें आभाव है. विभिन्न संगठनों में समय काटते हुए उनकी कार्यशैली भी सामाजिक जनवादी प्रदूषण का शिकार हो रही है और निराशा का  दीमक उनके भीतर भी पैठा हुआ है. उनके राजनितिक-सांगठनिक जीवन के व्यवहार  ने उन्हें स्वतन्त्र एवं निर्णय  लेने की क्षमता से लैस वह साहसिक चेतना और समझ नहीं दी है कि वे महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की सच्ची माओवादी स्पिरिट में ‘विद्रोही न्यायसंगत है’ के नारे पर अमल करते हुए अवसरवादी नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह कर दें और अपनी पहल पर कोई नई शुरुआत कर सकें. लेकिन जो कतारें सैद्धांतिक मतभेदों और विवादों की जटिलताओं को नहीं समझ पाती है, उनके सामने यदि कोई सही लाइन व्यवहार में, निरूतरता और सुसंगति के साथ, लागू होती और आगे बढती दिखाई देती है तो फ़िर निर्णय तक पहुँचने में वे ज़रा भी देर नहीं करती. आगे भी ऐसा होगा. इतिहास और वर्तमान के इसी आकलन और विश्लेषण के आधार पर हमारा मानना है कि भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का जो चरण नक्सलवादी से शुरू हुआ था, वह कमोबेश गत शताब्दी के नवें दशक तक ही समाप्त हो चुका था. हमें आज के समय को उस दौर की निरंतरता के रूप में नहीं, बल्कि उसके उत्तरवर्ती दौर के रूप में देखना होगा, यानि निरंतरता और परिवर्तन के ऐतिहासिक द्वंद में आज हमारा ज़ोर परिवर्तन के पहलू पर होना चाहिए. निस्संदेह नक्सलबाड़ी और कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन की विरासत को हम स्वीकार करते हैं और उसके साथ एक आलोचनात्मक सम्बन्ध निरंतर बनाये रखते हैं, लेकिन हमारे लिए वह अतीत की विरासत है, हमारा वर्तमान नहीं है. आज भावी भारतीय सर्वहारा क्रांति का हरावल दस्ता इस अतीत की राजनितिक संरचनाओं को जोड़-मिलाकर संघटित नहीं किया जा सकता क्योंकि ये राजनितिक संरचनाएं अपनी बोल्शेविक स्पिरिट और चरित्र, मुख्य रूप से, ज्यादातर मामलों में, खो चुकी है. यानि एक एकीकृत पार्टी बनाने की प्रक्रिया का प्रधान पहलू आज बदल चुका है. आज कार्यक्रम व निती विषयक मतभेदों को हल करके विभिन्न क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संगठनों का  ढांचा नए सिरे से बनाने का प्रश्न बन गया है. यानि क्लासकीय लेनिनवादी शब्दावली में कहें तो, प्रधान पहलू पार्टी-गठन का नहीं बल्कि पार्टी-निर्माण का है. जिसे अबतक कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर कहा जाता रहा है, वह मूलत: और मुख्यत: विघटित हो चुका है. अब शिविर के नेतृत्व से ‘पालिमिक्स’ के जरिए पार्टी-पुनर्गठन की अपेक्षा नहीं की जा सकती. बेशक जनमानस को प्रभावित करने वाले किसी भी विचार की आलोचना और उसके साथ बहस  का काम तो होता ही रहता है और इससे क्रांतिकारी कतारों की वैचारिक-राजनितिक शिक्षा भी होती रहती है, लेकिन ऐसी किसी संगठन के साथ एकता बनाना नहीं हो सकता. हम आज ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते.

नये सिरे से पार्टी निर्माण में अख़बार की भूमिका

यह सही है कि यूनियनें मज़दूर वर्ग के लिए वर्ग संघर्ष की प्राथमिक पाठशाला होती हैं, लेकिन ट्रेड यूनियन कार्रवाईयों से अपने आप पार्टी कार्य संगठित नहीं हो जाता. मजदूरों को ट्रेड यूनियनों में संगठित करने और उनके रोजमर्रे के संघर्षों को संगठित करने के प्रयासों के साथ-साथ हमें उनके बीच राजनितिक प्रचार का काम-समाजवाद के प्रचार का काम, मज़दूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन के प्रचार का काम शुरू कर देना होगा. मज़दूर आन्दोलन में वैज्ञानिक समाजवाद की विचारधारा केवल ऐसे सचेतन प्रयासों से ही डाली और स्थापित की जा सकती है. इस काम में मज़दूर वर्ग के एक राजनितिक अख़बार की भूमिका सबसे अहम होगी. ऐसा अख़बार राजनितिक प्रचार-संगठनकर्त्ता -आन्दोलनकर्त्ता के हाथों में पहुच कर स्वयं एक प्रचारक-संगठनकर्त्ता-आन्दोलनकर्त्ता बन जाएगा तथा मजदूरों के बीच से पार्टी-भरती और मजदूरों की क्रांतिकारी राजनितिक शिक्षा का प्रमुख साधन बन जाएगा. ऐसे अख़बार के मज़दूर रिपोर्टरों-एजेंटों-वितरकों का एक पूरा नेटवर्क खड़ा किया जा सकता है, उसके लिए मजदूरों से नियमित सहयोग जुटाने वाली टोलियाँ बनाई जा सकती हैं  और अख़बार के नियमित जागरूक  पाठकों को तथा मज़दूर रिपोर्टरों-एजेंटों को लेकर जगह-जगह मजदूरों के मार्क्सवादी अध्ययन-मंडल संगठित किए जा सकते हैं. इस प्रक्रिया में मजदूरों के बीच से पार्टी-भरती  और राजनितिक शिक्षा के काम को आगे बढाकर हमें पार्टी-निर्माण के काम को आगे बढ़ाना होगा. इस तरह मजदूरों के बीच से पार्टी-संगठनकर्त्ताओं की भरती और तैयारी के बाद ही ट्रेड-यूनियन कार्य को आगे की मंजिल में ले जाया जा सकता है तथा उसे अर्थवाद-ट्रेडयूनियनवाद से मुक्त रखते हुए क्रांतिकारी लाइन पर कायम रखने की एक  बुनियादी गारंटी हासिल की जा सकती है. साथ ही, ऐसा करके  ही, किसी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी पार्टी के कम्पोजीशन में मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आए पेशेवर क्रांतिकारी व एक्टिविस्ट साथियों के मुकाबले मज़दूर पृष्ठभूमि के साथियों का अनुपात क्रमश: ज़्यादा से ज़्यादा बढाया जा सकता है, पार्टी के क्रांतिकारी सर्वहारा हिरावल चरित्र को ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत बनाया जा सकता है, पार्टी के भीतर विजातीय तत्वों और लाईनों के खिलाफ़ नीचे से निगरानी का माहौल तैयार किया जा सकता है और इनकी ज़मीन कमज़ोर की जा सकती है. इसके साथ ही कम्युनिस्ट संगठनकर्त्ताओं   को व्यापक मजदूर आबादी के बीच तरह-तरह की संस्थाएं जनदुर्ग   के स्तंभों  के रूप में खड़ी करनी होगी  और व्यापक सार्वजनिक मंच संगठित करने होंगे. ये संस्थाएं और ये मंच न  केवल वर्ग के हिरावल दस्ते  को वर्ग के साथ मजबूती  से जोड़ने का काम करेंगे, बल्कि इनके नेतृत्व और संचालन  के जरिए आम मेहनतकश राजकाज  और समाज के ढांचे को चलाने का प्रशिक्षण भी लेंगे तथा अभ्यास भी करेंगे. इसे जनता की वैकल्पिक सत्ता के भ्रूण के रूप में देखा जा सकता है, जिन्हें शुरुआती दौर से ही हमें सचेतन रूप से विकसित करना होगा. भविष्य में इनके असली रूप किस रूप में सामने आएंगे, यह हम आज नहीं बता सकते, लेकिन क्रांतिकारी लोक स्वराज्य पंचायत के रूप में हम वैकल्पिक लोक सत्ता के सचेतन विकास की इस अवधारणा को प्रस्तुत करना चाहते हैं. अक्तूबर क्रांति के पूर्व सोवियतों का विकास स्वयंस्फूर्त ढंग से  (सबसे पहले 1905-07 की क्रांति के दौरान) हुआ था, जिसे बोल्शेविकों ने सर्वहारा सत्ता का  केन्द्रीय ऑर्गन बना दिया. अब इक्कीसवीं शताब्दी में, भारत के सर्वहारा  क्रांतिकारियों को नई समाजवादी क्रांति की तैयारी करते हुए मेहनतकश वर्गों की वैकल्पिक क्रांतिकारी सत्ता को सचेतन रूप से विकसित करना होगा और ऐसा शुरुआती दौर से ही करना होगा. यह एक विस्तृत चर्चा का विषय है, लेकिन यहाँ इंतना बता देना ज़रूरी है  कि आज की दुनिया में मजबूत सामाजिक अवलंबों वाली किसी बुर्जुआ राज्यसत्ता को आम बगावत के द्वारा चकनाचूर करने के लिए “वर्गों के बीच लंबा अवस्थितिगत युद्ध” अवश्यम्भावी होगा और इस “युद्ध” में सर्वहारा  वर्ग और मेहनतकश जनता के ऐसे जनदुर्गों की अपरिहार्यत: महत्वपूर्ण भूमिका होगी. साथ ही, जनता की वैकल्पिक सत्ता के निर्माण की प्रक्रिया को सचेतन रूप से आगे बढाकर ही, क्रांति के बाद सर्वहारा जनवाद के आधार को व्यापक बनाया जा सकता है और पूंजीवादी पुनर्स्थापना के लिए सचेष्ट बुर्जुआ तत्वों के विरुद्ध सतत् संघर्ष अधिक प्रभावी, निर्मम, निर्णायक और समझौताहीन ढंग से चलाया जा सकता है. स्पष्ट है कि नई समाजवादी क्रांति की सोच से जुड़ी वैकल्पिक सत्ता के सचेतन निर्माण की अवधारणा के पीछे सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की शिक्षाओं  की अहम भूमिका है.

शुरुआत कहाँ से करें?

सर्वहारा के हिरावल दस्ते के फ़िर से निर्माण की प्रक्रिया आज, अभी प्रारंभिक अवस्था में है, बस शुरुआत करने की स्थिति में है.ऐसी स्थिति में सभी मोर्चों पर सभी कामों को एक साथ हाथ में कभी नहीं लिया जा सकता. आज महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि शुरुआत कहाँ से करें और हमारे कामों की प्राथमिकता क्या हो? पार्टी निर्माण के काम को आज का प्रमुख काम मानते हुए,सबसे पहले यह ज़रूरी है कि हम चंद चुने हुए औथोगिक केन्द्रों में औधोगिक सर्वहारा वर्ग  के बीच अपनी मुख्य एवं सर्वाधिक ताकत केंद्रित करें. वहां मजदूरों के जीवन के साथ एकरूप होकर क्रांतिकारी संगठनकर्त्ताओं को ठोस परिस्थितियों के हर पहलू की जाँच पड़ताल एवं अध्ययन करना होगा, मजदूर आबादी के बीच तरह-तरह की संस्थाएं बनाकर रचनात्मक कार्य करने होंगे , ताकत एवं अनुकूल  अवसर के हिसाब से मजदूरों के रोजमर्रे के आर्थिक एवं राजनितिक संघर्षों में भागीदारी  करते हुए उनके बीच व्यवहार  के धरातल पर क्रांतिकारी वाम राजनीती का प्राधिकार स्थापित करना होगा और इसके साथ-साथ राजनितिक शिक्षा एवं प्रचार की कार्रवाइयां  विशेष जोरदेकर संगठित करनी होंगी. यह जरूरी है कि मजदूर वर्ग के बीच से पार्टी-भरती और उस नई भरती की राजनितिक शिक्षा  एवं सांगठनिक-राजनितिक कार्यों में उसके मार्गदर्शन के लिए मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन और समाजवाद का सीधे प्रचार करते हुए,मजदूरों के शिक्षक, प्रचारक और संगठनकर्त्ता की भूमिका निभाए. ऐसा अख़बार पार्टी-निर्माण के प्रमुख उपकरण की भूमिका निभाएगा. लेकिन पार्टी-निर्माण के काम की इस प्रारंभिक अवस्था में भी, बुनियादी विचारधारात्मक कार्यभारों की उपेक्षा नहीं की जा सकती या उन्हें टाला नहीं जा सकता. विपर्यय और पूंजीवाद पुनरूथान के वर्तमान अंधकारमय दौर में पूरी दुनिया की बुर्जुआ मिडीया और बुर्जुआ राजनितिक साहित्य ने समाजवाद के बारे में तरह-तरह के कुत्सा प्रचार करके विगत सर्वहारा क्रांतियों की तमाम विस्मयकारी उपलब्धियों को झूठ के अम्बार तले ढँक दिया है. आज की युवा पीढी सर्वहारा क्रांति के विज्ञानं और विगत सर्वहारा क्रांतियों की वास्तविकताओं से सर्वथा अपरिचित है. उसे यह बताने की जरूरत है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत क्या कहते हैं और इन सिद्धांतों  को अमल में लाते हुए बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रांतियों ने क्या उपलब्धियां हासिल की. उन्हें यह बताना होगा कि सर्वहारा क्रांतियों के प्रथम संस्करणों की पराजय कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी और फ़िर उनके नए संस्करणों का सृज़न और विश्व  पूंजीवाद की पराजय भी अवश्यम्भावी है. उन्हें यह बताना होगा कि विगत क्रांतियों ने पराजय के बावजूद पूंजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने का उपाय भी बताया है और इस सन्दर्भ में चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की शिक्षायों का युगांतरकारी महत्व है. आज के सर्वहारा  वर्ग की नई पीढी को इतिहास की इन्हीं शिक्षाओं से परिचित  करानेके कार्यभार को हम नए सर्वहारा पुनर्जागरण का नाम देते हैं. लेकिन इक्कीसवीं सदी की सर्वहारा क्रांतियाँ हू-ब-हू बीसवीं सदी की सर्वहारा क्रांतियों के नक्शे कदम पर चलेंगी, ऐसा ज़रूरी नहीं है. ये अपनी महान पूर्वज क्रांतियों से ज़रूरी बुनियादी शिक्षाएं लेंगी और फ़िर इस विरासत के साथ, वर्तमान परिस्थितियों का अध्ययन करके, पूँजी की सत्ता को निर्णायक शिकस्त देने की रणनीति एवं आम रणकौशल विकसित करेंगी. यह प्रक्रिया गहन सामाजिक प्रयोग, उनके सैद्धांतिक समाहार, गंभीर शोध-अध्ययन, वाद-विवाद, विचार-विमर्श और फ़िर नई सर्वहारा क्रांतियों की प्रकृति, स्वरूप एवं रास्ते से सर्वहारा वर्ग और क्रांतिकारी जनसमुदाय को परिचित कराने की प्रक्रिया होगी. इन्हीं कार्यभारों को हम नए सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभार के रूप में प्रस्तुत करते हैं. मार्क्सवादी दर्शन को सर्वोतोमुखी नई समृद्धि तो भावी नई समाजवादी क्रांतियाँ ही प्रदान करेंगी, लेकिन यह प्रक्रिया नए सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों को अंजाम देने के साथ ही शुरू हो जायेगी. नए सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभार विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय के वर्तमान दौर में, तथा विश्व पूंजीवाद की प्रकृति एवं कार्यप्रणाली का अध्ययन करके श्रम और पूँजी के बीच के विश्व-ऐतिहासिक महासमर के अगले चक्र में पूँजी की शक्तियों की अन्तिम पराजय को सुनिश्चित बनाने की सर्वोतोमुखी तैयारियों के कठिन चुनौतीपूर्ण दौर में, सर्वहारा वर्ग के अनिवार्य कार्यभार हैं जिन्हें सर्वहारा वर्ग का हिरावल  दस्ता अपनी सचेतन कार्रवाईओं के द्वारा नेतृत्व प्रदान करेगा. ये कार्यभार पार्टी-निर्माण के कार्यभारों के साथ अविभाज्यत: जुड़े हुए हैं और पार्टी-निर्माण के प्रारम्भिक चरण से ही इन्हें हाथ में लेना ही होगा, चाहे हमारे ऊपर अन्य आवश्यक राजनितिक-सांगठनिक कामों का बोझ कितना भी अधिक क्यों न हो! इन कार्यभारों  को पूरा करने वाला नेतृत्व ही नई समाजवादी क्रांति की लाइन को आगे बढ़ाने के लिए सैद्धांतिक अध्ययन और ठोस सामाजिक-आर्थिक-राजनितिक परस्थितियों के अध्ययन के काम को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा पायेगा.

नई समाजवादी क्रांति के तूफ़ान को निमंत्रण दो!

इतिहास में पहले भी कई बार ऐसा देखा गया है कि राजनितिक पटल पर शासक वर्गों के आपसी संघर्ष ही सक्रीय और मुखर दिखते हैं तथा शासक वर्गों और शासित वर्गों के बीच के अंतर्विरोध नेपथ्य के नीम अंधेरे में धकेल दिए जाते हैं. ऐसा तब होता है जब क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर हावी होती है. हमारा समय विपर्यय और प्रतिक्रिया का ऐसा ही अँधेरा समय है. और यह अँधेरा पहले के ऐसे ही कालखंडों की तुलना में बहुत अधिक गहरा है, क्योंकि यह श्रम और पूँजी के बीच के विश्व ऐतिहासिक महासमर के दो चक्रों के बीच का ऐसा अन्तराल है, जब पहला चक्र श्रम की शक्तियों के पराजय के साथ समाप्त हुआ है और दूसरा चक्र अभी शुरू नहीं हो सका है. इसलिए, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि भावी क्रांतियों को रोकने के लिए विश्व-पूंजीवाद आज अपनी समस्त आत्मिक-भौतिक शक्ति का व्यापकतम, सूक्ष्मतम और कुशलतम इस्तेमाल कर रहा है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि विश्व ऐतिहासिक महासमर के निर्णायक चक्र के पहले, प्रतिक्रिया और विपर्यय का अँधेरा इतना गहरा है और गतिरोध का यह कालखंड भी पहले के ऐसे ही कालखंडों  की अपेक्षा बहुत अधिक लंबा है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पूरी दुनिया में नई सर्वहारा क्रांतियों की हिरावल शक्तियां अभी भी ठहराव और बिखराव की शिकार हैं. यह सबकुछ इसलिए है कि हम युग-परिवर्तन के अबतक के सबसे प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला में जी रहे हैं. यह एक ऐसा समय है जब इतिहास का एजेंडा तय करने की ताकत शासक वर्गों के हाथों में है. कल इतिहास का एजेंडा तय करने की कमान सर्वहारा वर्ग के हाथों में होगी. यह एक ऐसा समय है  जब  शताब्दियों के समय में चंद दिनों के काम पूरे होते हैं, यानि इतिहास की गति इतनी मद्धम होती है कि गतिहीनता का आभास होता है. लेकिन इसके बाद एक ऐसा समय आना ही  है जब शताब्दियों के काम चंद दिनों में अंजाम दिय जायेंगे. लेकिन गतिरोध के इस दौर की सच्चाईओं को समझने का यह मतलब नहीं है कि हम इतिमिनान और आराम के साथ काम करें. हमें अनवरत उद्विग्न आत्मा के साथ काम करना होगा, जान लडाकर काम करना होगा. केवल वस्तुगत परिस्थतियों  से प्रभावित होना इंकलाबियों की फित्रित नहीं. वे मनोगत उपादानों से वस्तुगत सीमायों को सिकोड़ने-तोड़ने के उद्यम को कभी  नहीं छोड़ते. अपनी कम ताकत को हमेशा कम करके ही नहीं आंका जाना  चाहिए. अतीत की क्रांतियाँ बताती हैं कि  एक बार यदि सही राजनितिक लाइन के निष्कर्ष तक पहुच जाया जाए और सही सांगठनिक लाइन के आधार पर सांगठनिक काम करके उस राजनितिक लाइन को अमल में लाने वाली क्रांतिकारी कतारों की शक्ति को लामबंद कर दिया जाए तो बहुत कम समय में हालात को उल्ट-पुलटकर विस्मयकारी परिणाम हासिल  किए जा सकते हैं. हमें धारा के एकदम विरुद्ध तैरना है. इसलिए, विचारधारा पर अडिग रहना होगा, नए प्रयोगों के वैज्ञानिक साहस में रत्ती  भर कमी नहीं आने देनी होगी, जी-जान से जुटकर पार्टी-निर्माण के काम को अंजाम देना होगा और वर्षों के काम को चंद दिनों में पूरा करने का ज़ज्बा, हर हालत में कठिन से कठिन स्थितियों में भी बनाये रखना होगा|

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