सर्वहारा का समाजवाद और अध्यात्मक समाजवादियों का विज्ञान और तकनीक के विकसित होने पर रुदन

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“औजार मनुष्यों द्वारा निर्मित किए जाते हैं | जब औजार क्रांति की माँग करते हैं , वे मनुष्यों के अंदर से बोलते हैं”– माओ त्से तुंग

समाजवादी कैंप जिसका संबंध सर्वहारा और कुम्युनिस्टों से है के ढह ढेरी हो जाने के बाद सभी अध्यात्मिक समाजवादियों, गाँधीवादियों और लोहियावादियों की पौ बारह हो गई है | पिछले  दिनों श्री अफ़लातून जो समाजवादी जनपरिषद के प्रधान भी हैं की ब्लॉग http://samatavadi.wordpress.com पर प्रकाशित सामग्री के अधय्यन का अवसर मिला|  लेख को आगे बढ़ाने से पहले श्री अफ़लातून द्वारा संपादित ब्लॉग को नज़रसानी कर  लें,

(देखे इंग्लैण्ड और अमरिका जैसा बनाने का मतलब )

दरअसल सभी अध्यात्मिक और विचारवादियों की भाँति गाँधीवादी और लोहियावादी समाजवादियों की समस्या अपने विचारवाद से है | विचारवाद और भौतिकवाद { जिसे मार्क्स, लेनिन और माओ ने अपने अब तक के उच्चतम स्तर द्वन्दात्मक भौतिकवाद तक पहुँचाया ) के बीच की लड़ाई उतनी ही पुरानी है जितना सभ्य समाज और वर्ग संघर्ष का इतिहास | वर्ग विहीन आदिम समाज एक भौतिकवादी समाज था | किसी  भी सभ्यता के प्राचीन ग्रंथों का वस्तुगत और क्रमवार अध्ययन इस बात की पुष्टि करवाएगा कि किस प्रकार मानव के वर्गीय समाज मे संक्रमण से धीरे-धीरे शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच विभाजन से ही विचारवाद और अध्यात्मिकवाद की उत्पत्ति हुई| वर्गीय समाज के विकास के इतिहास को जाने बिना पूंजीवाद के अंतर्विरोधों, शोषण, बेरोज़गारी,,प्रदूषण आदि का तटस्थ अध्ययन ही नहीं किया जा सकता | औद्योगीकरण और निरंतर विकसित होती हुई तकनीक को सभी समस्याओं की जड़ मान लेना बचकाना होगा क्योंकि मानव समाज के विकास की गति हमारी इच्छा के बाहर स्वतंत्र रूप से निरंतर जारी रहती है| किसी मनुष्य की मनोगत इच्छाओं द्वारा इस पर काबू पाना ही अध्यात्मिकवाद व विचारवाद कहलाता है|

अध्यात्मिकवाद समाजवादियों का समाजवाद पेटी-बुर्जुआ समाजवादियों से थोड़ा-थोड़ा नहीं बल्कि काफ़ी हद तक मेल ख़ाता है | यह बात नहीं है कि वे औद्योगीकरण के बिल्कुल विरुद्ध हैं और बिल्कुल आदिम समाज के औजारों से काम चलाने के पक्ष में हों– वे औद्योगीकरण चाहते हैं मगर उस सीमा तक जिससे छोटा किसान, छोटा दुकानदार, राज्य  के और अन्य सार्वजनिक व निजी उपक्रमों में लगे हुए लोगों का रोज़गार निर्बाध रूप से जारी रह सके | इस तरह की भोली ख्वाहिशें रखना इतिहास के पहिए को उल्ट दिशा में घूमाना होगा | समाजवादी खेमें की हार के बाद वे  इस नतीजे पर पहुँच जाते है कि औद्योगीकरण ( अति ) ही समाजवाद की हार का कारण रहा, दूसरे शब्दों में औद्योगीकरण और समाजवाद एक दूसरे के दुश्मन हैं और इस नतीजे पर पहुँच जाते हैं कि सोवियत यूनियन की हार उसके औद्योगीकरण से हुई, अन्य सभी बहुत से कारणों की स्वैच्छिक उल्लंघना की जाती है, जैसे कि उत्पादन की शक्तियों के विकास के बारे में स्टालिन की यांत्रिक (द्वन्दात्मक नहीं ) पहुँच  जिसकी कमियों को माओ ने आत्मसात करते हुए  सर्वहारा के सता में आ जाने पर उसे समाजवाद ( समाजवाद से साम्यवाद में रूपांतरण की लम्बी समयाबधि जिसे संक्रमण  काल भी कहते हैं ) में अधिसंरचना में सतत संघर्ष चलाने के लिए क्रांति के बाद सांस्कृतिक क्रांति पर बल दिया| ध्यान रहे वैज्ञानिक  समाजवाद कोई ऐसी इतिहास की आदर्श और स्थाई अवस्था  नहीं है जिसकी रूपरेखा  किसी  महामानव के दिमाग की उपज हो बल्कि एक ऐसा भौतिक धरातल और रणक्षेत्र है जिसमें वर्गों में आपसी संघर्ष की अवस्था होने के कारण पूँजी और श्रम के बीच का अन्तरविरोध जारी रहता है जिसके साम्यवाद में रूपांतरण और विपरीत में परिवर्तन की सम्भावनाये बराबर बनी रहती हैं–समाज आगे बढेगा या पीछे , का निर्धारण सर्वहारा और बुर्जुआ तत्वों जो इस संक्रमण काल की गतिकी  की लाजिमी शर्त होते हैं के प्रधान तत्व पर होती है | दूसरी बात, किसी भी समाज के आधारभूत ढांचे और उस पर विराजमान अधिसंरचना अर्थात संस्थाएं जैसे विधानपालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, शिक्षा, धर्म आदि में आपसी सामंजस्य होना चाहिए | जब उत्पादन की शक्तियां अधिक विकसित हो जाती हैं परन्तु उत्पादन सम्बन्ध प्राचीन  बने रहते  हैं तो अधिसंरचना में तनाव आ जाता है और वे इन संबंधों  को तोड़ने के लिए लालायित हो जाती है | अब सवाल पैदा होता है की चीन में समाजवाद में ऐसी कौनसी  कमी थी कि  उत्पादन की शक्तियों के विकसित होने के बावजूद वह उच्चतर पड़ाव साम्यवाद में संक्रमित होने की बजाए निम्न पूंजीवाद में रूपांतरित हो गया| इतिहास की द्वंदात्मक समझ बताती है कि इतिहास की गति रैखिक और यांत्रिक न होकर पेंचदार और कुटिल होती है| साधारण ढंग से देखने और सोचने से ऐसा लगेगा की इतिहास वापिस उसी अवस्था में आ गया है जहाँ से शुरू हुआ था परन्तु सिद्धान्तिक  समझ यह देख लेगी कि वह अब भी तुलनात्मक और   गुणात्मक सतर पर उच्चतर पड़ाव पर है | सोविएत यूनियन और चीन की समाजवाद की हारों की समीक्षा करते हुए हमें सामन्तवाद से पूँजीवाद में रूपांतरण की उस लम्बी समयाबधि के उन एतिहासिक  तथ्यों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए  जब पूंजीवाद तुलनात्मक तौर पर अधिक तार्किक और न्यायसंगत होने के वावजूद सामन्तवादी व्यवस्था से कई बार हारा है और पहली वार यूरोप में उन्नीसवीं सदी में उसकी निर्णायक जीत हुई | यह अलग विषय है कि  पूंजीवाद जो अपने जन्म से ही लूला और लंगड़ा था को सर्वहारा की ओर से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा और करना पड़ रहा है |

धन के पैदा होने में  प्रकृति के अलावा मनुष्य  के श्रम की अहम और अपरिहार्य रूप से आवश्यकता होती है  जो उसकी विनमय मूल्य निर्धारत करता है, जिस प्रकार धन का स्रोत मानवीय श्रम है उसी प्रकार ज्ञान का स्रोत भी मानवीय श्रम है, दूसरे शब्दों में द्वंदात्मक भौतिकवादी अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास में यकीन करते हें जबकि विचारवादियों के साथ इसके बिल्कुल विपरीत है| अपने चिट्ठे के विषय सूची को बनाने सम्बन्धी आई मुश्किलों का जिक्र करते संबंधी श्री अफलातून लिखते हैं ”  यहाँ ‘समाजवादी जनपरिषद’ की तमाम प्रविष्टियों के शीषक उनकी कड़ियों-सहित दे रहा हूँ। प्रविष्टियों का वर्गीकरण इस अनुक्रमणिका के लिए किया है। काश, प्रविष्टियाँ छापते वक्त यही वर्गीकरण रखा होता !” लेकिन कैसे? कोई दिव्या शक्ति उनका मार्ग दर्शन करती? नहीं, उन्हें यह मुहारत कड़े अनुभव से  ही मिल सकती थी और उन्होंने इस कड़े अनुभव का जिक्र अपने उस प्रष्ठ पर किया जिसका उन्हें तो कोई लाभ नहीं होगा लेकिन हम जैसे नौसिखुए उस कवायद को दुहराने से बच जायेंगे| औद्योगीकरण  और तकनीक की अवधाराणाओं को एक दूसरे में गढ़ मढ़ करने से भी बचना चाहिए | लेकिन तकनीक  का अब तक का इतिहास बिना औद्योगीकरण किए बिना कैसे सम्भव होता? विज्ञानं को केवल तकनीक तक आंकना और उसके विकास की समग्रता ( एक इकाई के विकास में अन्य बहुत सी इकाईओं के योगदान और बदले में स्वयं विकसित होने का इतिहास) को नजरअंदाज करना एकांगीपन कहलाता है| मसलन इन्टरनेट की सुविधा जिससे हम अपने विचारों को हजारों, लाखों लोगों  तक ले जा पाने की इच्छा तो रखे परन्तु यह कहें कि इसका विकास अमुक देश के लिए अनुचित है, हमारे विचारों के एकांगीपन को उजागर करेगा|

मार्क्सवाद एक पक्षावलम्बी, बल्कि सर्वहारा वर्ग का सर्वोच्च पक्षावलम्बी विज्ञान है| इस विज्ञान को ओर विकसित करने वाले सेवादार लेनिन, स्तालिन, माओ आदि को बुर्जुआ  वर्ग से मुखातिव होते हुए किसी छदम की आवश्यकता नहीं थी परन्तु बुर्जुआ वर्ग के सेवादारों को अपने अल्पसंख्यक स्वामी वर्ग की हिफाजित  के लिए बहुसंख्यक  वर्ग के सामने मुखौटे लगाकर जाने की आवश्यकता होती  है| गांधीजी महात्मा भी थे  और समाजवादी भी! लेकिन अजीब किस्म के| उनके समाजवाद में सर्वहारा वर्ग की दशा में  किसी प्रकार के सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती थी जब 1920 में अहमदाबाद के  मजदूरों में पहले तजुर्बे के बाद महात्मा गाँधी ने कहा था, “हमें मजदूरों के साथ सांठ-गांठ नहीं करनी चाहिए| फैक्टरी सर्वहारा का राजनितिक हितों के लिए इस्तेमाल खतरनाक है|” (मई 1921 के ‘दा टाईम्स’)

पूंजीवाद से पहले के सभी वर्गीय समाजों में  उत्पादन  की क्रिया का वस्तुत: इस प्रकार का समाजीकरण नहीं हुआ था जैसा  तकनीक की मदद द्वारा औद्योगीकरण से हुआ| उत्पादन  की क्रिया का समाजीकरण परंतु उत्पादन पर निजी स्वामित्व भी इसके अन्य अंतरविरोधों में निहित है जिसके कारण यह उस सर्वहारा से सहमा रहता है जिसने कंगाली के समुद्र में रहते हुए खुशहाली के चंद टापू पूंजीपतियों की ऐशगाह के लिए सृजित किए हैं| मार्क्स और एंगेल्स के लिए सत्ता का प्रश्न ही सर्वहारा का  मुख्य  प्रश्न था जिससे उपरोक्त अंतरविरोध हल होने के युग की शुरुआत होती है  | ऐसा  लगता है की  गांधीजी जो की उनके उत्तराधिकारियों की पीढी के थे को कम्युनिस्ट घोषणापत्र में वर्गों के पूर्ण उन्मूलन की अवधारणा ने सबसे ज्यादा चिंतित किया| सदियों से विराजमान स्वामी वर्ग के अधिनायकवाद की मौत को वे आत्मसात नहीं कर पा रहे थे| इससे चिंतित वे केवल  तकनीक  और औद्योगीकरण के प्रयोग की एकांगी चेतावनी ही नहीं देते बल्कि मुख्य धारा की राजनीती को  सर्वहारा को राजनीती  से दूर  (मार्क्स और एंगेल्स के उल्ट)  रखने की सलाह भी देते हैं और इस प्रकार ‘कम्युनिस्म की  भूत’ रूपी कठौती (गांधीजी के लिए) को फेंकते समय वे तकनीक और औद्योगीकरण  के लाभों रूपी बच्चे को भी फेंक देते हैं|

और अंत में कार्ल मार्क्स के यह शब्द

“हमारे युग में हर वस्तु अपने गर्भ में अपना विपरीत गुण धारण किए हुए प्रतीत होती है. हम देख रहे हैं कि मानव श्रम को कम करने और उसे फलदायी बनाने की अदभुत शक्ति से संपन्न मशीनें लोगों को भूखा मार रहीं हैं, उन्हें थककर चूर कर रही हैं. सम्पदा के नूतन स्रोतों को किसी अजीब जादू-टोने के जरिए अभाव के स्रोतों में परिणत किया जा रहा है. तकनीक की विजयें चरित्र के पतन से खरीदी जाती लगती हैं. मानवजाति  जिस रफ्तार से  प्रकृति पर अपना प्रभुत्व कायम करती जा रही है, मनुष्य दूसरे लोगों का अथवा अपनी ही नीचता का दास बनता लगता है. विज्ञान का शुद्ध प्रकाश तक अज्ञान की अँधेरी पाश्र्व भूमि के अलावा  और कहीं आलोकित होने में असमर्थ प्रतीत होता है. हमारे सारे आविष्कार तथा प्रगति का यही फल निकलता प्रतीत  होता  है कि भौतिक-शक्तियों को बौद्धिक शक्ति बनाया जा रहा है तथा मानव जीवन को प्रभावहीन बनाकर भौतिक शक्ति बनाया जा रहा है. एक और आधुनिक उद्योग तथा विज्ञान के बीच दूसरी और आधुनिक कंगाली तथा अध:पतन के बीच यह वैर विरोध; हमारे युग की उत्पादक शक्तियों तथा सामाजिक संबंधों के बीच यह वैरविरोध स्पृश्य दुर्दमनीय तथा अकाट्य तथ्य है. कुछ पार्टियाँ इस पर विलाप कर सकती हैं; कुछ आधुनिक  संघर्षों  से छुटकारा पा सकने  के लिए आधुनिक   तकनीकों से छुटकारा पाने की दुआएं मांग सकती हैं. या वे यह कल्पना कर सकती हैं कि उद्योग में इतनी विशिष्ट उन्नति राजनीती में उतनी ही विशिष्ट अवनति से पूर्ण होनी चाहिए. अपनी और से हम उस चतुर शैतान की प्रवृति को पहचानने में भूल नहीं करते जो इन तमाम अंतर्विरोधों में निरंतर प्रकट होता रहा है.हम जानते हैं कि समाज की नूतन शक्तियों को ठीक तरह से काम करने के लिए जिस चीज़ की ज़रूरत हैं, वह है उन्हें नूतन लोगों द्वारा वश में लाया जाना–और ये हैं मेहनतकश लोग.”

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