बेर्तोल्त ब्रेष्ट की कलम से

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जनता की  रोटी

इंसाफ जनता की रोटी है

वह कभी  काफी है, कभी नाकाफी

कभी स्वादिष्ट है तो कभी बेस्वाद

जब रोटी दुर्लभ है: तब चारों ओर भूख है

जब  बेस्वाद है, तब असंतोष

खराब इंसाफ को फेंक डालो
बगैर प्यार के जो  भूना  गया हो
ओर बिना ज्ञान के गून्दा गया हो !
भूरा, पपड़ाया महक हीन इंसाफ
जो देर से मिले , बासी इंसाफ है !

यदि रोटी सुस्वादु ओर भरपेट है
तो बाकी भोजन के बारे में माफ किया जा सकता है
कोई आदमी एक साथ तमाम चीज़ें नहीं छक सकता |

इंसाफ की रोटी से पोषित
ऐसा काम हासिल किया जा सकता है
जिससे पर्याप्त मिलता है |

जिस तरह रोटी की जरूरत रोज़ है
इंसाफ की जरूरत भी रोज़ है
बल्कि दिन में कई-कई बार भी
उसकी ज़रूरत है |

सुबह से रात तक, काम पर, मौज लेते हुए
काम, जो कि  एक तरह का  उल्लास है
दुख के दिन ओर सुख के दिनों में भी
लोगों को चाहिए
रोज़-ब-रोज़ भरपूर, पौष्टिक, इंसाफ की रोटी |

इंसाफ की रोटी जब इतनी महत्वपूर्ण है
तब दोस्तो कौन उसे पकाएगा ?
दूसरी रोटी कौन पकाता है  ?
दूसरी रोटी की  तरह
इंसाफ की रोटी भी
जनता के हाथों पकनी चाहिए
भरपेट, पौष्टिक रोज़-ब-रोज़ !!

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