वर्गीय समाज में औरत की दशा

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परिवार को बचाने के करुण क्रंदन के खिलाफ

एक पत्र : कात्यायनी

प्रिय भाई,
‘बचा रहे परिवार!’ लेकिन क्यो? इस ” पवित्र संस्था ” से मोहासक्ती का कारण? क्यो बचा रहे परिवार? इसलिए  कि प्रेम जीवित रहे, उष्मा बनी रहे, नागरिकता की पहली पाठशाला सुरक्षित रहे ? सब बकवास है !
जिस तरह हर संपत्ति-साम्राज्य लूट, ठगी और अपराध की बुनियाद पर टिका होता है ठीक उसी तरह हर परिवार का ताना- बाना स्त्री की गुलामी और अस्मिता-विहीनताकी बुनियाद पर खड़ा है– चाहे वह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक ढाँचे वाला सामंती संयुक्त परिवार हो या पूंजीवादी ढंग से | परिवार वर्ग-निरपेक्ष संस्था नहीं| परिवार का प्यार मूल्य-मुक्त प्यार होता ही नहीं| पूर्ण समानता और स्वतंत्र  अस्मिता  की चाहत रखने वाली कोई स्त्री भला क्यो चाहेगी कि बचा रहे परिवार?नहीं ,कृपया मुझे अराजकतावादी या स्वच्छंदतावादी नं समझें | यह तो बुर्जुयाओं और उन फिलिस्टाइन बुद्धिजीवियों और अतीत की रागात्मकता के लिए विलाप करने वाले
अतीतजीवियों का गुण है |
इतिहास में पीछे की ओर चलें | एक विवाह प्रथा
की स्थापना के साथ ही एक ओर जहाँ मानव सभ्यता के उच्च्तर, अधिक वैज्ञानिक नैतिक मूल्यों का जन्म हुआ, वहीं पुरुष द्वारा स्त्री को दास बनाए जाने की शुरुआत भी यहीं से हुई | धीरे-धीरे स्त्री एक सजीव, पारिवारिक संपत्ति में रूपांतरित होती गई| संपत्ति-सन्चय और क़ानूनी वारिसों को उसका हस्तांतरण परिवार का मुख्य उद्देश्य बन गया |
सामंती समाज के पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढाँचे में उपर से जो रागात्मकता, स्त्री के प्रति उदार संरक्षण-भाव, यदा-कदा श्रद्धा भाव और उसके सौंदर्य के प्रति सूख्म जागरूकता दिखाई देती है, वह सब उपरी चीज़ है और खांटी ‘ पुरुष दृष्टि’  को वह सब कुछ भाता है |प्रतीति को भेदकर सार तक पहुँचने पर पता चलता है कि स्त्री सामंती समाज में विलासिता और निजी उपभोग की वस्तु मात्र थी और साथ ही वंश चलाने का ज़रूरी साधन| उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान या अस्मिता नहीं थी|
अपने ‘पवनी-परजा’, हाथी-घोड़े, नौकरों आदि के प्रति संरक्षण भाव रखने वाले सामंत स्त्रियों  के प्रति संरक्षण-भाव रखते थे. इस प्रभावी संस्कृति से, कुछ भिन्नता (सापेक्षिक आजादी)  के बावजूद किसान एवं भूदास परिवार की स्त्रियाँ भी अलग नहीं थी. साथ ही वे सामंतों द्वारा उपभोग्य भी मानी जाती थी. यही पुराने परवारिक ढांचे की “सुखद रागात्मकता” और काव्यात्मकता है, जिसके टूटने-बिखरने  पर आज दुखी आत्माएं विलाप कर रही हैं.

पूंजीवाद ने अपनी जरूरतों से स्त्रियों को चूल्हे-चौखाठे की गुलामी  से आंशिक मुक्ति दिलाई और स्त्रियाँ को दोयम दर्जे की नागरिकता देने के साथ ही उसे निकृष्टतम कोटि का उजरती गुलाम बनाकर सडकों पर धकेल दिया. पूंजीवाद के विकसित ‘अवस्था की उपभोक्ता संस्कृति में, सूचना तंत्र, प्रचार तंत्र और नए मनोरंजन-उद्योग के अंतर्गत स्त्री ख़ुद में एक उपभोक्ता  सामग्री बनकर रह गई. पुराने सामंती परिवार के राग-अनुराग को तोड़कर पूँजी ने घटिया उपयोगितावाद  को जन्म दिया और पूँजी पर, निजी लाभ के आधार पर खड़े पूंजीवाद परिवार में बेगानापन (Alienation) पोर-पोर में रच बस गया. “मध्ययुगीन प्यार” के स्वप्नलोक वें विचरण करती दुखी आत्मायों को लगने लगा कि परिवार टूट रहा है, प्रलय आ रहा है. लेकिन यह परिवार का “टूटना” नहीं बल्कि उसका पूंजीवादी रूपांतरण था.
आज के भारत में जिसे “परिवारों का टूटना-बिखरना” कहा जा रहा है, वह क्या है? उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय समाज भूमि-संबंधों के ‘जुन्कर  टाईप’ रूपांतरण और उद्योगों के विकास के साथ ही एक अर्द्धऔद्योगीकृत  समाज में क्रमश: रूपांतरित होता चला गया है. यहाँ साम्राज्यवाद पर निर्भर, एक बौना, बीमार, विकलांग पूंजीवाद विकसित हुआ है. अठारवीं-उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय पूंजीवाद से भिन्न, उपनिवेशवाद के गर्भ से जन्मा, साम्राज्यवादी विश्व-परिवेश में पला-बढ़ा यह पूंजीवाद जीवन के हर क्षेत्र में सामंती मूल्यों-मान्यताओं से समझौतों किए हुए है, उन्हें ‘एडाप्ट’ किए हुए है और स्वस्थ जनतांत्रिक  मूल्यों एवं तर्कपरकता  से रिक्त है. इस संक्रमणकालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की पीड़ा दोहरी है. संयुक्त परिवार के ढांचे के टूटने, नाभिक परिवारों के बढ़ते जाने और आंशिक सामाजिक आजादी के बावजूद मूल्यों-मान्यताओं के धरातल पर वह पितृसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता को भी  भुगत रही है और उपभोक्ता संस्कृति की नई नग्न निरंकुशता को भी. पति उसे शिक्षित और आधुनिक देखना-दिखाना चाहता है. अपनी मित्र मण्डली को प्रभावित  करना, उसे  जलाना चाहता है, पर यह नहीं चाहता कि वह इसकी इच्छाओं की सीमारेखा लांघकर किसी पुरूष से (या यहाँ तक कि किसी स्त्री से भी) स्वतन्त्र सम्बन्ध बनाये. वह यह तो चाहता है कि घर का बोझ हल्का करने के लिए पत्नी कमाए, पर यह नहीं चाहता कि वह अपने दफ्तर या कारखाने में स्वतन्त्र रिश्ते बनाये. यंत्र मानव की तरह वह बस पैसे कमाये और आज्ञाकारी सुशील पत्नी की तरह समय से घर आ जाए. उच्च से लेकर उच्च मध्यवर्ग तक में, किटी पार्टियाँ, लायंस-रोटरी की पार्टियों में जाने की आजादी है और पत्नियों की  अदलाबदली और स्वच्छंद यौनापभोग का खुला-गुप्त चलन  भी बढ़ रहा है. मध्य वर्ग से लेकर कामगार वर्गों तक की कामकाजू स्त्रियों का शारीरिक-मानसिक श्रम सबसे सस्ता है. बाहरी कामकाज या नौकरी में पुरूष से अधिक श्रम करने के बावजूद उसे घर का कामकाज और बच्चों का लालन-पालन भी करना है. कुछ “उदार” पति इसमें हाथ बांटकर उसे उपकृत जरूर करते रहते हैं.
कुल मिलाकर, पूंजीवादी किस्म का निजी स्वामित्व आज हमारे समाज में भी परिवार के अन्दर सम्भन्धों के रूप  को मुख्यत: प्रभावित करने लगा है. भौतिक स्वार्थ और विवाह के वाणिज्यिक लाभों की उपस्थति स्पष्ट है. पुरानी रागात्मकता समाप्त  हो रही है और पति-पत्नी रिश्तों तक में बेगानापन घुल चुका है. पति-पत्नी के बीच के यौन सम्बन्ध भी अस्सी फीसदी मात्रा में वैधिक वेश्यागमन और सामाजिक मान्यताप्राप्त बलात्कार ही है.

और तब आप सभी फ़िलिस्ताईन आत्माएं “जाने कहाँ गए वो दिन…..” गाते हुए. रोते-सिसकते हुए, पुराने समय के “रागात्मक प्यार” और सुखद माहौल को याद करते हुए अंतत: करुण क्रंदन कर उठते हैं–“बचा रहे परिवार!”

सामाजिक विकास की इस मंजिल पर पहुंचकर पूंजीवादी परिवार का ताना-बाना भी पूरी दुनिया में दूटने-बिखरने लगा है. हमारे देश में परिवार के पितृसत्तात्मक  ढांचे की रागात्मकता  लगभग नष्ट हो चुकी है और पूंजीवादी परिवार की जो सामाजिक इकाई पैदा हुई है, वह जन्म से ही विकलांग, बीमार और शैशवकाल  में ही संकटग्रस्त है. कारण कि समाजवाद  पर विजय की उन्मत्त घोषणाओं और प्राथमिक सामाजिक प्रयोगों की बिफलता के बावजूद यह सच है कि पूंजीवाद  अब मानवता को कुच्छ भी सकारात्मक दे सकने की क्षमता खोकर अन्तकारी रोगों से ग्रस्त हो चुका है. परिवार के पूंजीवादी ढांचों को भी नष्ट होना ही है–पश्चिम में भी, रूस व पूर्वी यूरोप में भी तथा एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका में भी. इसे आप बचा नहीं सकते. और सामंती पितृसतात्मक मध्ययुगीन सामाजिक-पारिवारिक ढांचे की रागात्मकता के “स्वर्ण-युग” को वापस ला नहीं सकता. फ़िर फालतू का रोना-कलपना काहे को? वर्तमान की समस्या का समाधान अतीत में नहीं है. इतिहास के स्वाभाविक गति में जो चीज टूटनी है वह तो टूटनी ही है. पूंजीवादी समाज की ही तरह क्षरित-विघटित होते पूंजीवाद परिवार की पीड़ा-व्यथा, यंत्रणा-विकृति से मुक्ति का एकमात्र तरीका समाज-विकास की गति के आम नियमों और आम दिशा को समझकर उस दिशा में अपनी चेष्टाओं को निर्देशित करना ही हो सकता है– चाहे वह सामाजिक सक्रियता के क्षेत्र में हो या कलात्मक-सांस्कृतिक उद्यम के क्षेत्र में.
प्यार को बचाने के लिए परिवार को बचना जरूरी नहीं है. समाज के नैतिक-आत्मिक-सौन्दर्यात्मक मूल्यों और भौतिक जरूरतों की एक अभिव्यक्ति समाज के इस नाभिक के रूप में हुई, जो निजी दैनंदिन जीवन के संघटन का सबसे महत्वपूर्ण रूप थी. पर मानवीय सारतत्व और प्यार की अभिव्यक्ति भविष्य के नए समाज में किसी और संघटन के रूप में होगी. यदि उसे परिवार की संज्ञा दी भी जाए तो कम से कम यह कहना होगा कि उसका ढांचा मौजूदा पारवारिक ढांचे से गुणात्मक रूप से भिन्न होगा. उसमें संपत्ति संचय, उत्तराधिकार और निजी लाभ का तत्व नहीं होगा. उसमें बाध्यता या विवशता का कोई तत्व नहीं होगा. कानूनी पारिवारिक संघटन की आवश्यकता और आर्थिक उपभोग-संबंधो के महत्त्व के घटते जाने के साथ ही, नई सामाजिक-आर्थिक संरचना के अंतर्गत स्त्री-पुरूष सम्बन्ध और माता-पिता-सन्तान सम्बन्ध के नये रूप और उनके नए,परिष्कृत, नैतिक-सौन्दर्यात्मक-मनोवैज्ञानिक पहलू विकसित होंगे. यह एक लंबा संक्रमण काल होगा, पर इतिहास विकास की आम दिशा यही है. समाजवादी संक्रमण के शुरुआती अल्पकालिक अवधि में ही पारिवारिक जीवन और स्त्री की स्थिती में आये परिवर्तनों ने इसे सिद्ध कर दिखाया कि यह सम्भव है और देर-सवेर यही होगा. मौजूदा विपर्यय चिरस्थाई नहीं है.
भारत में जिस तरह पूरे सामाजिक-राजनितिक तंत्र में, ठीक उसी तरह आत्मिक-निजी जीवन में भी एक पुरानी बुराई का स्थान नई बुराई ने ले लिया है. पितृसत्तात्मक सामंती पारवारिक ढांचे की स्वेच्छाचारिता, कूपमंडूक रागात्मकता, स्त्रियों के पार्थक्य (segregation) आदि का स्थान आज बाज़ार-उपनिवेशवाद के दौर में पूंजीवादी पारवारिक  ढांचे की निरंकुशता, नग्न यौन-उत्पीडन, उपभोक्ता संस्कृति और बेगानापन (Alienation) ने ले लिया है. और यह नया ढांचा अभी से क्षरनशील     है, विघटनोंमुख है. साथ ही, सकारात्मक पहलू यह भी है कि स्त्री के भीतर अपनी अस्मिता की नई  पहचान और नई मुक्ति-चेतना पैदा हुई है. अभी वह सहस्त्राब्दियों पुराने संस्कारों से मुक्त नहीं हो सकी है, पर अब वह दिन दूर भी नहीं कि वह सच्ची समानता व स्वतन्त्र इच्छा पर नैतिक प्यार की उदात्तता व गरिमा को हासिल करने के लिए परिवार की मौजूदा संस्था, इसके व्यभिचारी, उत्पीड़क, शोषक, निरंकुश स्वरूप को लात मारकर ध्वस्त कर देगी. इसे बचाने की गुहार बेकार है. वर्तमान की दुर्दशा का समाधान अतीत में नहीं, भविष्य में देखना होगा.
आगे की एक शताब्दी के दौरान जो कुछ घटित होगा, उसके बारेमें सोचते हुए मार्क्स और एंगेल्स द्वारा आज से लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व कही गई बातें बरबस याद आ जाती हैं और आम दिशा एवं आम रूपरेखा के तौर पर आज भी प्रासंगिक प्रतीत होती हैं. ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ के एक पूरे हिस्से पर हमें गौर करना चाहिए और “परिवार को बचाने” की चिल्ल-पों बंद कर देनी चाहिए :

“परिवार का विनाश! कम्युनिस्टों के इस कलंकपूर्ण प्रस्ताव से कट्टर से कट्टर उग्रवादी भी भड़क उठते हैं.
“मौजूदा परिवार, पूंजीवादी परिवार, किस आधार पर खड़ा  है? पूँजी पर, निजी फायेदे पर. अपने पूर्ण विकसित रूप में इस तरह का परिवार केवल पूंजीपति वर्ग के बीच पाया जाता है. यह स्थिति अपना संपूरक सर्वहारा  वर्ग में परिवार के व्यवहारत: अभाव और बाजारू वेश्यावृत्ति में पाती है.
“वह संपूरक जब मिट जाएगा तो सामान्य क्रम में पूंजीवाद परिवार भी मिट जाएगा, और पूँजी के मिटने के साथ-साथ ये दोनों मिट जायेंगे.
“क्या आप हमारे ऊपर यह आरोप लगाते हैं कि हम बच्चों का उनके माता-पिता द्वारा शोषण किया जाना बंद कर देना चाहते हैं?
इस अपराध को हम स्वीकार करते है.
“लेकिन आप कहेंगे कि घरेलू शिक्षा की जगह सामाजिक शिक्षा कायम करके हम एक अत्यन्त पवित्र सम्बन्ध को नष्ट कर देते हैं.
“और आपकी शिक्षा? क्या वह भी सामाजिक नहीं है और उन सामाजिक अवस्थायों से निर्धारित नहीं होतीहै, जिनमें आप समाज के, प्रत्यक्ष या परोक्ष, हस्तक्षेप से स्कूलों आदि के ज़रिए शिक्षा देते हैं? शिक्षा में हस्तक्षेप कम्युनिस्टों की ईजाद नहीं है; कम्युनिस्ट तो केवल इस हस्तक्षेप के स्वरूप को बदल देना चाहते हैं और शासक वर्ग के प्रभाव से शिक्षा का उदार करना चाहते हैं.
“जैसे-जैसे आधुनिक उद्योग की क्रिया द्वारा सर्वहारा वर्ग में समस्त पारिवारिक संबंधों की धज्जियाँ उड़ती जा रही हैं; वैसे-वैसे परिवार और शिक्षा तथा माता-पिता और बच्चों  के पुनीत अन्योन्य सम्बन्ध के बारे में पूंजीपतियों की बकवास ओर भी घिनौनी दिखाई देने लगी है.
“लेकिन पूरा का पूरा पूंजीपति वर्ग गला फाड़कर एक स्वर में चिल्ला  उठता है–तुम कम्युनिस्ट तो औरतों को सर्वोपभोग्य बना दोगे!
“पूंजीपति वर्ग अपनी पत्नी को उत्पादन के एक औजार के सिवा कुछ नहीं समझाता. उसने सुन रखा है कि कम्युनिस्ट समाज में उत्पादन के औजारों का सामूहिक रूप में उपयोग होगा. इसलिए, स्वभावत; वह इसके आलावा और कोई निष्कर्ष  नहीं निकाल पाता कि समाज में सभी चीजों की तरह औरतें भी सवोपभोग्य हो जाएँगी.
” वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकता कि दरअसल मकसद  यह है कि औरत की उत्पादन के औजार जैसी स्थिति को ख़तम कर दिया जाए.
“कुछ भी हो, स्त्रियों  की सर्वोपभोग्यता के खिलाफ पूंजीपतियों के सदाचारी आक्रोश से अधिक हास्यास्पद दूसरी और कोई चीज़ नहीं है; वे यह समझने का बहाना करते हैं कि कम्युनिज्म के अंतर्गत स्त्रियों की सर्वोपभोग्य खुल्लमखुल्ला स्थापित करने की कोई ज़रूरत नहीं है, वह बाबा आदम के ज़माने से चली आ रही है.
“हमारे पूंजीपतियों को मजदूरों की बहू-बेटियों को अपनी मर्जी के मुताबिक इस्तेमाल करने से संतोष नहीं होता, वेश्याओं से भी उनका मन नहीं भरता, इसलिए एक दूसरे की बीवियों पर हाथ साफ  करने में उन्हें विशेष आनंद प्राप्त होता है.
“पूंजीपति विवाह वास्तव में पत्नियों की साझेदारी की ही एक व्यवस्था है, इसलिए कम्युनिस्टों  के खिलाफ अधिक से अधिक यही आरोप लगाया जा सकता है कि वे स्त्रियों की सर्वोपभोग्यता की मौजूदा ढोंगपूर्ण और गुप्त प्रथा  को खुला, कानूनी रूप दे देना चाहते हैं. कुछ भी हो, बात अपने-आप में साफ है कि उत्पादन की वर्तमान  व्यवस्था जब ख़तम हो जायेगी, तब स्त्रियों की उस व्यवस्था से उत्पन्न सर्वोपभोग्यता के, अर्थात बाजारू और खानगी, दोनों प्रकार की वेश्यावृत्ति  का, अनिवार्वत: अंत हो जाएगा.”-
—-(मार्क्स-एंगेल्स : कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र)
हमारे देश के अधिकांश प्रगतिशील  और वामपंथी लेखक-चिन्तक इस मामले में दिग्भ्रम-संभ्रम-विभ्रम-मतिभ्रम के शिकार हैं और समाज की इस बुनियादी कोशिका-परिवार के वर्ग-स्वरूप और पूँजी की नानाविध गतियों की वैज्ञानिक समझदारी के अभाव में वे कभी नैतिकतावादी पोंगा पंडित बन बैठते हैं, तो कभी अवैज्ञानिक, अराजकतावादी, स्वच्छंदतावादी बुर्जुआ नारीवाद की इस या उस धारा के साथ मधुयामिनी व्यतीत करने की घोषणा कर बैठते हैं. अब यह बात दीगर है कि उन्हें उस प्रश्न से निशा-निमंत्रण कभी नहीं प्राप्त होते…और तब कुढ़कर, या थककर वे उत्तर आधुनिकतावादी विमर्श में लीन हो जाते हैं या नारी-मुक्ति प्रसंग का उत्तर-मार्क्सवादी वृतांत रचने लगते हैं.
….बहरहाल, लुब्बे ,लुब्बाब यह है कि मैं परिवार को बचाने के विलाप में कतई शिरकत नहीं कर सकती. प्रश्न परिवार को बचाने का नहीं, एक उच्चतर नैतिक-सौन्दर्यात्मक-उदात्त धरातल पर मानवीय प्रेम  की प्राण-प्रतिष्ठा का है, एक ऐसी सामाजिक कोशिका के निर्माण का है जिसमें स्त्री पूर्ण समानता, स्वावलंबन और स्वतन्त्र अस्मिता के आधार पर, घरेलू गुलामी के सभी रूपों से मुक्ति पाकर, सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया  में बराबर की भागीदारी करते हुए, जिसे चाहे प्यार कर सके और पा सके. हमें अब तक मौजूद परिवार के सभी किस्म के ढांचों के नाश की कामना करनी चाहिए और समाज को इस दिशा में आगे ले जाने का सचेतन उद्यम करना चाहिए.
मेरी कवितायों में प्यार की कामना कहीं भी “सुखी पारिवारिक  जीवन” की कामना के रूप में प्रगट नहीं होती. ‘औरत और घर’ एक भूतपूर्व नगरबधू की दुर्गपति से प्रार्थना’, ‘त्रिया चरित्र पुरुषस्य भाग्यम्..’ आदि कविताएँ उदाहरण हैं.

—-‘दुर्ग द्वार पर दस्तक’ से.

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