सर्वहारा और समाजवाद

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भारत की वस्तुपरक
स्थिति,सर्वहारा
और समाजवाद

सर्वहारा की उन्नत इकाइओं को विरोधों की एकता की अवधारणा को आत्मसात करना होगा

किसी भी समाज में क्रांति के कार्यभार को पुरा करने से पहले उस समाज की ऐतिहासिक  मन्जिल कि वह इतिहास के किस पड़ाव पर है को पुरा करना होता है | दुनिया के कुछ गिनती के देशों को छोड़ कर लगभग सभी देश पूंजीवाद में प्रवेश कर चुके है | भारत में भी पूंजीवाद इसकी सामाजिक सरंचना की कोशिकयों में (भले ही जुन्कर तरीके से ही सही ) अपनी पूर्ण घुसपैठ कर चुका है | पच्चास प्रतिशत से अधिक आबादी का सर्वहारीकरण हो चुका है | खेती में विज्ञानं, आधुनिक तकनीक और मशीनीकरण ने किसान को उसकी एक श्रमिक की भूमिका से अलग कर दिया है | छोटे किसानों के भूमिहीन होकर मजदूर के रूप में शहरों की ओर  पलायन करने की गति में गुणात्मक बढोतरी हुई है और इसके साथ साथ बड़े किसानों का बुर्जुया अथवा पेटी बुर्जुया में रूपांतरण हो चुका है |दूसरे शब्दों में उसका चरित्र क्रांतिकारी न होकर प्रतिक्रियावादी है और वह अन्य प्रतिक्रियावादी वर्गों के साथ मिलकर बड़े पूंजीपतियों से अतिरिक्त मूल्य से अपना हिस्सा बढ़ाने के लिए शौर शराबा करता रहता है |

दूसरी और सर्वहारा की जीवन परस्थितियाँ बद से बदत्तर होती जा रही हैं | शहर से लेकर गाँव तक जीवन की आवश्क्तायों की पूर्ति के लिए मुद्रा की शर्त जरूरी बन गई है | आवास, शिक्षा, सेहत सेवाएं तो दूर उसके लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल होता जा रहा है| अनाज की कीमत में हुई भारी वृदि ने उसका जीना दूभर  कर दिया है | ऐसे में किसानों के साथ मिलकर उसका सांझे मोर्चे में शामिल होना असम्भव हो गया है|सरकार की ओर से चलाई जाने वाली सस्ते अनाज की योजनाओं के लिए इतने कम फंड अलाट किए जाते है और फ़िर शहरो और गावों में वितरण प्रणाली की पारदर्शिता भी जग जाहिर है | और वैसे भी सस्ते अनाज के लिए दी जाने वाली सब्सिडी का असर सर्वहारा पर ही पड़ना होता है | किसानों की फसल के लिए समर्थन मूल्य में बढौतरी के लिए संघर्ष करने वाली राजनितिक पार्टियाँ जिनमे संसद मार्गी कम्युनिस्ट दल भी शामिल है का यह तर्क होता है की सस्ते अनाज के लिए दी जाने वाली सब्सिडी की पूर्ति बडे पूजीपतियों पर टैक्स लगाकर की जा सकती है | इस तर्क का सहारा लेने वाले लोग मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के नियम की जानबूझ  कर अवहेलना करते हैं और उनकी भूमिका एक अवसरवादी दल की भूमिका से अलग नहीं होती |

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One thought on “सर्वहारा और समाजवाद

    ramesharya said:
    September 13, 2008 at 10:23 AM

    you showed reallity of capitalism….for the uplifting of commen men…should be welcome and envisage upon Marx and Engel..The world needs once more Lenin

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