भारत और इक्कीसवीं शताब्दी का समाजवाद

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भक्ति कालीन पुनर्जागरण और उसकी

असम्यक ह्त्या

कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ |

जो घर जारे  आपना   चले हमारे साथ ||

समाजवाद के प्रथम चरण के संसार भर में असफल हो जाने के बाद ( समाजवाद अपने प्रथम चरण में अपने अगले उच्च्तर पड़ाव साम्यवाद में प्रवेश करने में असफल रहा है और ज्यादातर कम्यूनिस्ट पार्टियों के चरित्र का बोलेश्विक तत्व या तो हार मान चुका है या फिर पूर्णतया अपने उल्ट में प्रवर्तित हो चुका है !) सर्वहारा के सच्चे सैनिक निठ्ठले बैठे हों, ऐसी स्थिति कि कल्पना मात्रा द्वंदात्मक भौतिकवाद से मुँह फेर लेना होगा | चौदवीं शताब्दीसे शुरू होने वाली भक्तिकालीन पुनर्जागरण की परम्परा जैसा कि श्री दामोदरन का कहना है ,”यदि यह आंदोलन सदा के लिये सामाजिक असमानताओं और जातिप्रथा से उत्पन्न अन्यायों को ख़त्म नहीं कर सका तो संभवत इसका कारण यह था कि कारीगर, व्यापारी और दस्तकार, जो इस आन्दोलन का मुख्य आर्थिक आधार थे, अब भी कमजोर और असंगठित थे, और इससे पहले कि उदयीमान पूंजीपति वर्ग एक वर्ग के रूप में अपना पूर्ण विकास प्राप्त करे, ब्रिटिश पूंजीपतियों ने देश को जीतकर अपने कब्जे में कर लिया और उसे ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग (और वह भी कालोनी के रूप में ) बना लिया | ( पूर्वोद्धृत, ३३७ ) को दूसरे शब्दों में इस तरह से कहा जा सकता है कि भारत में पूंजीवाद की जो विरोधविकास की स्वाभाविक अंदरूनी गतिथी जिसने यूरोप के पुनर्जागरण के महामानवों की श्रृंख्ला की भांति भारत की धरती पर रामानंद, कबीर,रैदास, दादू, मीरा और गुरु नानक की अगली उच्चतर पीढी को जन्म देना था की भ्रूण हत्या हो गई | कुछ अपवादों को दरकिनार करते हुए इसके वाद की श्रृंख्ला का बुद्धिजीवी अपेक्षित बौना पैदा हुआ | बौधिक क्षेत्र की इस गतिहीनता को दूर करने का कार्यभार भी अब सर्वहारा के कंधो पर गया है | … अगली किश्त में जारी

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