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मार्क्सवाद की द्वंदात्मक प्रणाली पर दो अति महत्वपूर्ण ऑडियो (पंजाबी)

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दसवी और बाहरवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकायों की जाँच का कार्य भी सत्र के समापन पर छुट्टियों में होता है. सरकारी अध्यापकों में से एक वर्ग ऐसा भी है जो स्कूल में कम पर अपने निजी व्यवसाय में ज्यादा दिलचस्पी रखता है. वह खंड और जिला मुख्यालय से संपर्क और चाटूकारता बनाए रखता है. उन अध्यापकों की  डियूटीयाँ कभी भी नहीं लगाई जाती. हरियाणा शिक्षा निदेशालय से एक सवाल. क्या छुट्टियाँ सभी अध्यापकों के लिए होती है? क्या ऐसा नहीं होता की कुछ अध्यापक तो छुट्टियों में ऐश कर रहे होते हैं जबकि कुछ सरकारी डियूटी बजा रहे होते हैं ? होना तो ऐसा चाहिए कि अधिकार और कर्तव्य सभी के लिए एक जैसे ...आगे पढ़े ऐसे चलती है भारतीय शिक्षा प्रणाली

लेकिन हमारी चिंता अन्ना हजारे नहीं है बल्कि  मध्यम वर्ग का वह बुद्धिजीवी है जिसमें किरण बेदी, बाबा रामदेव जस्टिस संतोष हेगड़े, वक़ील प्रशांत भूषण, स्वामी अग्निवेश  जैसे बुद्धिजीवी  लोग शामिल है. ऐसी बात तो है नहीं कि ये लोग यह न समझते हों कि असल मसला भ्रष्टाचार का नहीं मजदूर वर्ग के अधिशेष की लूट का  है. देश के कुल मूल्य उत्पादन में मजदूर वर्ग के हिस्से में केवल ६ प्रतिशत ही आते हैं. पता नहीं क्यों ये अन्ना हजारे जैसे लोग इस मसले पर चुप्पी  साधे रखते हैं. वैसे हम समझते है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं है कि इन्हें किसी अल्हड बच्चे की तरह कुछ भी पता न हो. अलबता इनकी मिडल वर्ग की मजबूरियां इन्हें अपनी हदे तोड़ने नहीं देती. लेकिन इतिहास गवाह है कि इस वर्ग से भी कुछ लोग अपनी हदे तोड़ते रहे हैं और रहेंगे और मजदूर वर्ग की नयी समाजवादी क्रांतियों में अपनी आहुतियाँ देते रहेंगे …आगे देखें अन्ना हजारे जी सर्वहारा वर्ग आपकी तरह पूंजीपति वर्ग को ब्लैकमेल करने के लिए मजबूर नहीं है.

अपने अनुभव से आम मेहनतकश जानते हैं कि पूँजीवाद यदि भ्रष्टाचार-मुक्त भी हो तो मज़दूरों को शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति नहीं मिल सकती। घपलों-घोटालों की सुर्ख़ियों पर सबसे अधिक चर्चा वह पढ़ा-लिखा, खाता-पीता मध्‍यवर्ग करता है, जो मीडिया के प्रचार से सम्मोहन की हद तक प्रभावित होकर सोचता है कि उदारीकरण की प्रगति से भारत बहुत तेज़ी से महाशक्ति बनता जा रहा है और यदि भ्रष्टाचार और काला धन समाप्त हो जाये तो देश की ख़ुशहाली सुनिश्चित है। मज़े की बात यह है कि मध्‍यवर्ग के यही लोग ख़ुद यदि भ्रष्टाचार का कोई अवसर मिले तो उसे कतई नहीं छोड़ेंगे, पर उनकी चाहत होती है कि नेता, मन्त्री, अफसर आदि भ्रष्टाचार न करें। मध्‍यवर्गीय अभिजन समाज भ्रष्टाचार-मुक्त पूँजीवाद चाहता है।…आगे पढ़े  बाबा रामदेव और अन्ना हजारे चाहते पूंजीवाद ही हैं लेकिन भ्रष्टाचार से मुक्त

मजदूर बिगुल के दिसंबर 2010 के अंक की सामग्री से परिचय

2010 : घपलों-घोटालों का घटाटोप

भारतीय पूँजीवादी जनतन्त्र का भ्रष्ट-पतित-गन्दा-नंगा चेहरा
नेता, अफसर, जज, मीडियाकर्मी – लूटपाट, कमीशनख़ोरी में कोई पीछे नहीं
2010 के पूरे वर्ष में कश्मीर में युवा, बच्चे और स्त्रियाँ तक सड़कों पर सेना के विरुध्द मोर्चा लेते रहे। महँगाई ने नये कीर्तिमान स्थापित किये। उबरने की लाख कोशिशों के बावजूद वैश्विक मन्दी से त्रस्त साम्राज्यवादी देश भारत की प्राकृतिक सम्पदा और श्रम सम्पदा को और अधिक निचोड़ने के मकसद से पूँजी लगाने और माल बेचने के लिए सौदेबाज़ी और होड़ करते रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा लाव-लश्कर सहित आये और भारत को ”उभर चुकी ताकत” बता गये।…आगे पढ़ें  मजदूर बिगुल के दिसंबर 2010 के अंक की सामग्री से परिचय

बिनायक सेन की सजा के साथ महाबली के जूनियर पार्टनर बुर्जुआ भारत के सन 2010 का समापन

महामंदी जिसे अब सुपर महामंदी कहा जा रहा है, से जूझ रहे विश्व पूंजीवाद और साम्राज्यवाद ने मेहनतकश जनता के राजनीतिक और आर्थिक (व्यक्तिगत और सामूहिक) हितों के विरुद्ध चलाये गए दमनचक्र में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. परन्तु विश्वभर से मेहनतकश अवाम और विशेषतया यूरोप के लोगों द्वारा पूंजीवादी संस्थापन के विरुद्ध आक्रोश की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है…आगे पढ़ें  बिनायक सेन की सजा के साथ महाबली के जूनियर पार्टनर बुर्जुआ भारत के सन 2010 का समापन

मूल्य का नियम 2 जिंसों की जड़पूजा

संसार में बहुत से लोग हैं जो वास्तव में शक्तिशाली हैं : राष्ट्रपति, सी. ई. ओ. बैंकर , लहरों के नेता…परन्तु एक वस्तु, एक चीज ऐसी है जो इनमें से प्रत्येक से अधिक शक्तिशाली है. वह वस्तु है, दौलत.

दौलत वास्तव में शक्तिशाली है. लोग, समाज और देश इससे हर प्रकार के काम कर सकते हैं. कई लोगों के जीवन को, मकसद के रूप में, दौलत की लालसा जकड़े रखती है और यह आर्थिक बढौतरी की चालक शक्ति होती है. और समस्त समाज में, धन प्रतिष्ठा, हैसियत और सामाजिक शक्ति का प्रतीक है….आगे पढ़ें  मूल्य का नियम 2 जिंसों की जड़पूजा

मूल्य का नियम 1 परिचय

आर्थिक संकट वैचारिक संकट का भी समय होता है. यह समय होता है जब लोग अपने विश्व दृष्टिकोण का पुनर्मुल्यांकन करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी सबसे मूलभूत पूर्वधारनाओं पर सवालिया निशान लगाने लगते हैं. प्रत्येक आर्थिक संकट से मुख्यधारा के आर्थिक चिंतन में पुनर्विचार और पुनर्गठन पैदा हुआ है. मजे की बात यह है कि यह पुनर्विचार सदैव आर्थिक प्रणाली के लिए रेडिकल चुनौती के सन्दर्भ में रहा है…आगे पढ़ें मूल्य का नियम 1 परिचय

मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते…आगे पढ़ें मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

दूध न हो

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