रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियों की विषय सूची

1. गीज़ो ने मार्क्स (1818-1883) को पेरिस से निकाल दिया. जर्मन पुलिस ने न केवल जर्मनी में कम्युनिस्टों को चैन से नहीं रहने दिया बल्कि विदेश में फ्रांस बेल्जियम और यहाँ तक की स्विट्ज़रलैंड में भी इसी तरह परेशान किया. इसके लिए उन्होंने…..

1847 में कम्युनिस्टों को सताया जाना

2. अमेरिकावासी लुईस हेनरी मॉर्गन (1818-1881) नृवंशविज्ञानी  और आदिम सामाजिक संगठनों के अध्येता थे. वह इराक्यू इंडियनों के बीच रहे, उन्हीं के जैसा जीवन जिया था और उनके आचरण तथा रीती-रिवाज का अध्ययन ….

हेक्स्टहाउज़ेन, मॉरेर और मॉर्गन

3. कुछ शताब्दियों में ही अफ्रीका उन श्वेतों का आखेट-क्षेत्र बन गया जो अमेरिकी बाज़ार के लिए नीग्रो दासों की तलाश में रहते थे. 1508 से 1860 के बीच “परोपकारी” पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और सर्वोपरि रूप से ब्रिटिश दास व्यापारियों के शिकार लगभग डेढ़ करोड़ नीग्रो अटलांटिक महासागर के पार जहाजों में भरकर लाये गए थे और ….

मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

4. जबकि उनके पूर्वगामी पूरी वस्तु को बनाया करते थे. इस प्रकार इस प्रक्रिया में वे एक औजार बन जाते हैं. इंग्लैंड में, हॉलैंड में और बाद में फ्रांस में पूंजीवादी उत्पादन का मैन्युफैक्चरिंग काल सोलहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में आरम्भ …

मैन्युफैक्चर

5. पुराने ग्रामीण सम्बन्ध अब ज्यादातर पूंजीवादी उत्पादन की दशाओँ के अनुकूल होते जा रहे थे. भूस्वामी कुलीन वर्ग और भूमिहीन किसान के साथ-साथ बड़ी जोत वाले किसान का उदय हुआ जोकि सार रूप में औद्योगिक पूंजीपति था जो भूमि पर उज़रती मजदूर के श्रम का शोषण करता था और इस प्रकार अपने लिए लाभ और भूस्वामी के लिए लगान निकालता था. उन्नीसवीं शताब्दी में कृषि में पूंजीवादी प्रवृत्ति बहुत सुस्पष्ट हो गयी थी…

औद्योगिक क्रांति और मशीन से उत्पादन का विकास

6. नीदरलैंड पहला बुर्जुआ राज्य बना और सत्रहवीं शताब्दी के बाद से ही अन्य सभी बुर्जुआ राज्यों के लिए मॉडल बन गया जोकि कालांतर में पश्चिमी यूरोप में स्थापित हुए….

बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

7. हर चीज़ बिकाऊ बन जाती है और हर चीज़ खरीदी जा सकती है. परिचलन वह विशाल सामाजिक दहनपात्र बन जाता है जिसमें हर चीज़ डाली जाती है और जिसमें से हर चीज़ मुद्रा का रूप धारण करके निकल आती है. यहाँ तक कि संतों की हड्डियाँ तक इस कीमियागिरी के सामने नहीं ठहर पाती हैं. इसमें से ज्यादा नाजुक चीजें, वे पवित्र चीजें जो मनुष्यों के व्यापारिक लेन-देन से बाहर हैं, तो इस कीमियागिरी के सामने और भी कम ठहर पाती हैं.

विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

8-9. आधुनिक उद्योग किसी भी उत्पादन प्रक्रिया के वर्तमान रूप को उसका अंतिम रूप नहीं समझता और न ही व्यवहार में उसे ऐसा मानता है. इसलिए इसका तकनीकी आधार क्रांतिकारी है जबकि इसके पहले वाली उत्पादन की तमाम प्रणालियाँ बुनियादी तौर पर रुढिवादी   थीं.

पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र और पूरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

10. उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान विश्व बाज़ार में आने वाले माल की संरचना में समग्र परिवर्तन हो गया. उत्तरी अमेरिका से गेहूं, कपास, पेट्रोलियम और ताम्बा, दक्षिणी अमेरिका से कॉफी, ग्वानों, चिली का शोरा, गोश्त; एशिया से गेहूं, जूट, कपास, चावल और चाय; आस्ट्रेलिया से गेहूं, गोश्त और ऊन- यह सब विविध सामान हजारों वाष्प-चालित जहाजों में समुद्री रास्ते से आते हैं और विश्व बाज़ार को मालों से पाट देते हैं.

विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

11. अंग्रेज़ व्यापारियों ने अपने सामानों, विशेषतया सूती सामानों की कीमत घटाकर ईस्ट इंडीज़ के उद्योग को बरबाद का दिया. समृद्धि के लिए वे केवल आर्थिक स्त्रोतों से संतुष्ट नहीं हुए बल्कि उन्होंने बिना किसी नैतिक हिचक के राजनितिक तौर-तरीकों का भी सहारा लिया. इस प्रकार उन्होंने बल प्रयोग से चीनियों को अफीम का आयात करने के लिए विवश कर दिया. इस मामले में अंग्रेजी नौसेना की जगह पर संयुक्त राज्य की नौसेना ने काम किया. 1854 के पैरी समझौता, 1875 का हैरिस समझौता और 1858 की येदो संधि द्वारा जापानियों को अपने कुछ बंदरगाह पश्चिमी व्यापार के लिए खोलने के लिए मजबूर कर दिया गया.

पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

12. “कृषि के क्षेत्र में आधुनिक उद्योग का सर्वाधिक क्रांतिकारी प्रभाव यह है कि यह पुराने समाज के आधार स्तम्भ – किसान – को नष्ट कर देता है और उसके स्थान पर उज़रत लेकर काम करने वाले मजदूर को स्थापित कर देता है…

शहर और गाँव के बीच दरार

13. इस वक्त जबकि संयुक्त राज्य संसार के सम्पूर्ण क्षेत्र के 7 प्रतिशत पर काबिज़ है जबकि इसकी आबादी विश्व की आबादी का 6 प्रतिशत से भी कम है, यह पूंजीवादी गणतंत्र विश्व के सोना उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के गेहूं उत्पादन का 25 प्रतिशत, विश्व के स्टील और लौह उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के सीसा उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के जिंक उत्पादन का 50 प्रतिशत, विश्व के चाँदी उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के कोयला उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के खनिज उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के अनाज उत्पादन का 75 प्रतिशत और विश्व के कार उत्पादन का 85 प्रतिशत पैदा करता है. यह समस्त चंद एक ट्रस्टों न्यासों के नियंत्रण में है जिनके शीर्ष पर रॉकफेलर मोर्गेन, फोर्ड, मैकार्मिक और आरमर जैसे बीस अरबपति है.

पूँजी का संचय

14. सन 1848 तक प्रकृति पर मनुष्य की विजय का काम बहुत धीमी गति से चल रहा था. फिर भी वाट के आविष्कार की व्यापक स्वीकृति के बाद वायु शक्ति और जलशक्ति के बेहतर इस्तेमाल के साथ-साथ वाष्पशक्ति के उपयोग का विकास तेजी से हो रहा था. 1820 से ओस्टेड (1777-1851), सीबेक (1770-1831) और फैराडे (1791-1867) जैसे वैज्ञानिकों ने विद्युत परिघटना के क्षेत्र में एक के बाद दुसरे आविष्कार किये. लेकिन विद्युत तार और विद्युत धातुशोधन के अपवाद को छोड़कर विनिर्माण उद्योग में इन आविष्कारों का लाभ नहीं उठाया जा सका. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी तृतीयाँश में उद्योग की एक शाखा के रूप में विद्युत तकनीक अस्तित्व में आ

पूंजीवाद और प्रकृति पर मनुष्य की विजय

15. ”आधुनिक उत्पादन और उत्पाद वितरण की अराजक स्थितियां, उत्पादन की वे स्थितियां जोकि आवश्यकता की तुष्टि के लिए न होकर लाभ से नियंत्रित होती है, वह स्थितियां जिसमें धनी बन जाने की कोशिश में प्रत्येक व्यक्ति खुद की स्वंतंत्र लीक पर काम करता है, ये स्थितियां बार-बार मंदी पैदा करने से नहीं चुकती हैं. औद्योगिक विकास के युग के आरंभ में मंदी उद्योग की एक या दूसरी शाखा या एक बाज़ार तक सीमित रहती थी. लेकिन प्रतिस्पर्द्धियों की कार्रवाईयों के चलते उद्योग की एक शाखा में रोज़गार से वंचित मजदूर उद्योग की दूसरी शाखा में रोज़गार पाने के लिए धावा बोल देते हैं जिसमें काम सीखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. इस प्रकार…..

संकटों के सिद्धांत और इतिहास के बारे में कुछ बाते

16. कि प्राचीन रोम में वर्ग संघर्ष स्वतन्त्र धनिकों और स्वतन्त्र निर्धनों यानि कि विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यकों के दायरे में जारी रहा था. दास वर्ग जोकि आबादी का बड़ा उत्पादक हिस्सा था, उस निष्क्रिय मंच का काम कर रहा था जिस पर यह संघर्ष चल रहा था. लोग सिसमोंदी की उल्लेखनीय उक्ति को भूल गए हैं कि ‘रोम का सर्वहारा राज्य के खर्च पर जीता था जबकि आधुनिक समाज सर्वहारा के दम पर जीता है”

सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक विकास

17. “दस्तकारी और मैन्युफैक्चर में मजदूर औजारों का इस्तेमाल करता है, कारखाना में मजदूर मशीन की सेवा करता है. पहली स्थिति में मजदूर श्रम के साधनों के संचालन पर नियंत्रण रखता है तो दूसरी स्थिति में मजदूर की गतिविधियाँ मशीन के अधीन होती हैं. विनिर्माण में मजदूर सक्रीय तंत्र का एक हिस्सा होते हैं. कारखानों में मजदूरों से स्वतन्त्र एक जड़ तंत्र होता है और मजदूर इसमें जीवित उपांगो की तरह शरीक होते हैं. अंतहीन चाकरी और कठिन परिश्रम की नीरस नित्य-क्रिया, जिसमें एक ही यांत्रिक प्रक्रिया को लगातार दुहराना पड़ता है, सिसिफस की यंत्रणा…

मैन्युफैक्चर और बड़े पैमाने के उत्पादन (मशीनोफैक्चर) की कालावधियों में श्रम विभाजन

18. “साधारण श्रम यानि (श्रमशक्ति की) उत्पादन लागत उस व्यय के बराबर होती है जो मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक होता है. मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के  लिए उजरत का भुगतान किया जाता है. इस प्रकार निर्धारित मज़दूरी को न्यूनतम मज़दूरी के नाम से जाना जाता है. न्यूनतम मज़दूरी का सम्बन्ध सामान्य मानव जाति से है न की अलग-अलग मज़दूर से है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार माल का मूल्य साधारणतया उनकी उत्पादन लागत से निर्धारित होता है. ऐसे मज़दूर कुछ ही नहीं होते बल्कि उनकी संख्या लाखों में होती है जिन्हें इतनी भी मज़दूरी नहीं मिलती कि अपना जीवन निर्वाह कर सकें और अपनी जाति का प्रजनन कर सकें. अपने खुद के उतार-चढाव के ढांचे के अन्दर रहते हुए मज़दूर वर्ग की उज़रत इस न्यूनतम मज़दूरी के अनुकूल बन जाती है.”

श्रम और श्रमशक्ति

19.अगर वह बिलकुल बेहूदा बातें उसमें शामिल कर लेता है, तब भी अदालतें मज़दूर से यही कहती हैं, कि : ‘तुमने ये करार अपनी मर्ज़ी से किया है, अब तो तुम्हें उसका पालन करना ही होगा…नौ वर्ष की आयु से मृत्यु तक इन मज़दूरों को हर घड़ी यह मानसिक और शारीरिक यातना सहन करनी पड़ती है.”

कारखाने का निरंकुशतंत्र

20 मशीनों का इस्तेमाल करने वाले पूंजीपतियों को सबसे पहले स्त्रियों और बच्चों के श्रम की तलाश होती थी. श्रम और श्रमजीवियों का स्थान लेने वाला यह शक्तिशाली यंत्र शीघ्र ही मज़दूर के परिवार के प्रत्येक सदस्य को, बिना किसी आयु-भेद या लिंग-भेद के, पूंजी के प्रत्यक्ष दासों में भरती करके उज़रती मज़दूरों की संख्या में वृद्धि करने का साधन बन गया

स्त्रियों और बच्चों का श्रम

21-22 आवास जितना घटिया होता उतना अधिक उसकी मरम्मत पर खर्च आता है और असंदिग्ध रूप से सर्वाधिक मंहगे वे आवास होते हैं जिसमें आबादी का निर्धनतम वर्ग निवास करता है. “आवासों के सट्टेबाज गरीबी की इन खानों से इतना अधिक मुनाफा कमाते हैं कि पोटोसी की चांदी की खानों के मालिकों के मुहं में भी पानी आ जाये.

मजदूर पूंजीपति को उधार देता है

23. काफी समय बीत जाने और काफी अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद मजदूर मशीन और पूंजी द्वारा मशीन के उपयोग में भेद कर पाए और उन्होंने अपने प्रहार का निशाना उत्पादन के भौतिक औजारों को नहीं बल्कि उस विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था को बनाना सीखा जो इन औजारों का उपयोग करती है

पूंजीवाद के खिलाफ मेहनतकश वर्ग के प्रतिरोध के विभिन्न रूप

24. दूसरे और तीसरे दशक में (1820-1840) अंग्रेज़ और फ्रांसीसी बुर्जुआ मजदूरों के नेता की भूमिका निभाने लगे थे और बुर्जुआ शतरंज में सर्वहारा को मोहरों की तरह इस्तेमाल कर रहे थे| इसी समय के बारे में मार्क्स  लिखते हैं:” एक और तो बड़े पैमाने का उद्योग खुद अपनी बाल्यावस्था पार  कर रहा था जिसका परिमाण यह है कि 1825 के संकट के साथ पहली बार उसके आधुनिक जीवन के आवधिक चक्र की शुरुआत होती है|

बुर्जुआ शतरंज में मोहरों के रूप में सर्वहारा

25. “इन संघों का इतिहास विरल विजयों से अलंकृत पराजयों की लम्बी श्रृंखला की कहानी है. यह बताने की ज़रुरत नहीं है कि ट्रेड यूनियनवाद अपनी सारी ताकत लगाकर भी इस स्थिति में नहीं आ पाता कि उस आर्थिक नियम को बदल दे जिसके अर्न्तगत, उज़रतें श्रम बाज़ार में मांग और आपूर्ति से तय होती हैं

ट्रेड यूनियन आन्दोलन का उद्भव और विकास

26. हड़तालों की घोषणा, ट्रेड यूनियनों का गठन, यूनियनों का पहले क्षेत्रीय संगठनों और बाद में राष्ट्रीय संगठनों में समेकन और उसके बाद कई यूनियनों से अस्थाई संघ बनाने की कोशिश करने का काम मेहनतकशों के राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ  चलता रहा और इसने 1836-37 के संकट के बाद गंभीर हलचल का रूप धारण कर लिया था. 1839 में नेशनल चार्टिस्ट एसोसिएशन की स्थापना उन मांगों के समर्थन में…

चार्टिस्ट आन्दोलन – मेहनतकश वर्ग का राजनीतिक संगठन

27. बुर्जुआ वर्ग की कतारों के बीच विरोध, पूंजीपति वर्ग के विभिन्न धडों के बीच अनबन, भूस्वामियों और औद्योगिक सम्पत्तिधारकों के बीच संघर्ष, एक ओर वित्तीय हितों के प्रतिनिधियों और दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग हितों के प्रतिनिधियों के बीच तीखी होड़ – इन सभी संघर्षों के बीच पूंजीवादी समाज के गठन में ही मौजूद है…

बुर्जुआ समाज के अंतरविरोध और सर्वहारा द्वारा इनका उपयोग

28.सर्वहारा वर्ग के शोषण का चरित्र और स्तर अन्य उत्पीडित तथा शोषित वर्गों से भिन्न होता है. माल उत्पादन के अर्न्तगत अर्थात पूंजीवाद (माल उत्पादन का वह रूप जिसमें माल के रूप में मानव श्रम बाज़ार में आता है) के अर्न्तगत केवल सर्वहारा शोषण की असली बुनियाद के खिलाफ लड़ता है क्योंकि अन्य वर्गों की अपेक्षा सर्वहारा वर्ग माल उत्पादन से अधिक प्रभावित होता है. माल उत्पादन के व्यवस्था में सर्वहारा वर्ग खुद की बिक्री से, अपनी श्रमशक्ति की बिक्री से अपनी गुज़र करता है जबकि अन्य उत्पीड़ित वर्ग (प्रत्येक किस्म के निम्न-बुर्जुआ, किसान, स्वतन्त्र कारीगर) का माल उत्पादन से कोई विरोध नहीं होता है. अपनी निम्नवर्गीय स्थिति के चलते वे केवल उन बंधिशों को ख़त्म करना चाहते हैं जो स्पर्द्धा के क्षेत्र में उनके उत्पाद को प्रतिकूल स्थिति में पहुंचा देती हैं…

सर्वहारा वर्ग, “जन-साधारण” और किसान वर्ग – शोषण के रूपों का महत्त्व

29. निजी संपत्ति समस्त पूंजीवादी समाज की आधारशीला है. न्याय और समानता के नाम पर बुर्जुआ ने इसे सामंतवाद की बेडियों से, एकाधिकार से और विशेषाधिकार से मुक्ति दिलाई. यह निर्दोष और सहज दिखनेवाली निजी सम्पति पूंजीवादी विकास के नियमों के कारण पूंजीवादी निजी संपत्ति में धीरे-धीरे तब्दील होने लगी अर्थात संपत्ति ने ऐसा रूप धारण किया जिसका अस्तित्व निजी संपत्ति से वंचित व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि पर निर्भर था. निजी संपत्ति की पवित्रता और अनुल्लंघनियता पर बुर्जुआ जितना अधिक संभ्रम फैलाता है…

सर्वहारा और कानून का सम्मान

30. “वर्ग विरोध पर आधारित समाज में शोषित वर्ग अनिवार्यत: विद्यमान रहता है. इसलिए शोषित वर्ग की मुक्ति से नए समाज का निर्माण होता है. शोषित वर्ग की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि विद्यमान उत्पादक शक्तियों  और प्रभावी सामाजिक सम्बन्ध परस्पर अनुकूल न हों. उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी वर्ग स्वयं सर्वाधिक ताकतवर उत्पादक शक्ति बन जाता है. क्रांतिकारी तत्त्वों के एक वर्ग के रूप में संघठन के लिए आवश्यक है कि पुराने समाज में समस्त उत्पादक शक्तियों का हर सम्भव विकास वास्तव में पूरा हो गया हो…

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र का विकास और क्रांति

31. उस स्थिति में भी जब मजदूर अपनी श्रमशक्ति को सर्वाधिक लाभप्रद शर्तों पर बेचने में सफल हो जाता है, जब वह अधिकतम मजदूरी प्राप्त करता है तब भी वह औद्योगिक चक्रों से उत्पन्न अव्यवस्था से प्रभावित रहता है और संकटों का शिकार बनता रहता है. उसे अस्तित्व की असुरक्षा, मजदूरी में उतार-चढाव, बेरोजगारी का निरंतर संकट यह सब मिलकर सर्वहारा की स्थिति को दास या भूदास की स्थिति से भिन्न बना देते हैं…

पूंजीवादी संचय मेहनतकश वर्ग के दरिद्रीकरण

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