सृजन परिप्रेक्ष्य

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एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक-सांस्कृतिक कार्यभार
(सांस्‍कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)
— सम्पादकीय आलेख

1. नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन — महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर 2. कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष। 3. सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यक्तिवाद, अराजकतावाद, उदारतावाद का विरोध करो! 4. ”वामपन्थी” कलावाद, रूपवाद और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो! 5. कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विरोध करो! 6. धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ! 7. दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ! 8. स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ! 9. कला-साहित्य-संस्कृति में ”लोकवाद” और ”स्वदेशीवाद” का विरोध करो! 10. न तो इतिहास-ग्रस्त, न ही इतिहास-विमुख! 11. सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न।    …….आगे पढ़ें।

सन्दर्श

समकालीन हिन्दी आलोचना: कुछ पद्धतिशास्त्रीय समस्याएँ — रामराज प्रसाद

”कला-साहित्य जगत में साहित्य और कला की समालोचना संघर्ष के प्रमुख तरीक़ों में से एक है।” — माओ त्से-तुङ

जाने-माने साहित्यकारों से अक़सर यह पूछने की इच्छा होती है कि क्या आपने हिन्दी की मार्क्‍सवादी आलोचना की दुनिया में कभी एक विद्यार्थी के समान, एक जिज्ञासु ”सजल-उर शिष्य” के समान प्रवेश करने की कोशिश की है? — नहीं कर सकते। बड़े लोग बच्चे नहीं बन पाते। गुरु शिष्य नहीं बन पाते। ऐसा अति दुष्कर होता है। पर यदि कभी-कभी ऐसा सम्भव किया जाता तो लाभप्रद होता। यदि एक नवागन्तुक की दृष्टि से देखने की कोशिश की जाए तो परिवेश की अव्यवस्था को जानने-समझने में पर्याप्त सहायता मिलती है।
हिन्दी आलोचना के महाभव्य भवन के सिंहद्वार से भीतर प्रवेश करते ही आपको भीषण कोलाहल सुनाई पड़ता है। घास भरे विशाल सूने आँगन और विशाल भव्य सूने बरामदे को पार करने के बाद, ”ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य” बनने की इच्छा रखने वाले को एकदम माथा फेर देने वाला दृश्य दीखता है!   …….आगे पढ़ें।

परम्परा-प्रसंग

इक्कीसवीं सदी में बाल्ज़ाक — कात्यायनी / सत्यम

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में, साहित्य के जागरूक यूरोपीय पाठकों के बीच यह मान्यता काफ़ी लोकप्रिय हुआ करती थी कि विश्व का महानतम उपन्यास ”युद्ध और शान्ति” है और महानतम उपन्यासकार बाल्ज़ाक हैं।
आज, एक शताब्दी बाद भी, विश्व-साहित्य के अध्येताओं का बहुलांश उपरोक्त धारणा से सहमत मिलेगा। पिछले डेढ़ सौ वर्षों के दौरान दुनिया के पाँच सार्वकालिक महानतम उपन्यासकारों की सूची जब कभी भी बनाई जाती तो उसमें बाल्ज़ाक का नाम शायद सबसे निर्विवादवाद और सुरक्षित होता। पिछले चार सौ वर्षों के विस्तृत विश्व-ऐतिहासिक कालखण्ड को सामने रखकर यदि उपन्यास-विधा पर केन्द्रित करें तो राबेले, सर्वान्तेस, डेफ़ो, फ़ील्डिंग, स्टर्न, दिदेरो, वाल्टर स्‍कॉट, स्टेण्ढाल, तुर्गनेव, तोल्स्तोय, दोस्तोयेव्स्की, डिकेन्स, थैकरे, थामस हार्डी, फ्लॉबेयर, ज़ोला, थामस मान, अनातोल फ्रांस, अप्टन सिंक्लेयर, जैक लण्डन, गोर्की, फ़देयेव, शोलोखोव, हेमिंग्वे, फॉकनर,…  …….आगे पढ़ें।

भाषा-चिन्तन

भाषा-विज्ञान के इतिहास में मार्क्‍सवाद और वोलोशिनोव — कात्यायनी / सत्यम

मानव-चिन्तन और संज्ञान की प्रक्रिया के सामान्य नियमों की खोज में आगे बढ़ते हुए, भाषा के प्रश्न से दर्शन की मुठभेड़ प्राचीन काल में ही हो चुकी थी। मानव-समाज की समस्त भौतिक और आत्मिक गतिविधियों के दौरान संज्ञानात्मक और संसर्गात्मक प्रकार्यों (function) की पूर्ति करनेवाली आधारभूत संकेत-प्रणाली के रूप में भाषा के विकास, उसकी प्रकृति और संरचना के अध्ययन के साथ-साथ, अव्यवस्थित ढंग से ही सही, पर शताब्दियों तक, दार्शनिक इन प्रश्नों से भी जूझते रहे कि भाषा किस हद तक मनुष्य की अन्य प्राणियों से इतर, प्राकृतिक- जैविक विशिष्टता की उपज है और किस हद तक यह एक सामाजिक परिघटना है।
यह धारणा मार्क्‍सवाद के जन्म से पहले ही मान्यता प्राप्त कर चुकी थी कि भाषा एक सामाजिक परिघटना है जो मानव कार्य-कलाप के समन्वय का साधन है। ऐतिहासिक भौतिकवाद ने भाषा-वैज्ञानिक चिन्तन को आगे बढ़ाते हुए उपरोक्त धारणा में यह बात जोड़ी कि भाषा सामाजिक उत्पादन के विकास के दौरान जन्म लेती है …….आगे पढ़ें।

नान्दिकर

ब्रेष्ट और स्तानिस्लाव्स्की साथ-साथ और आमने-सामने — सत्यव्रत

इस लेख में हमारा उद्देश्य ब्रेष्ट के एपिक थिएटर और स्तानिस्लाव्सकी की पद्धति का विस्तृत निरूपण प्रस्तुत करना नहीं है। हम यहाँ सामान्य तौर पर इन दोनों से परिचित पाठकों और रंगकर्मियों से मुखातिब हैं। इस लेख में हमारी आधारभूत स्थापना यह है कि (i) एपिक थिएटर और स्तानिस्लाव्स्की की पद्धति में सांगोपांग तुलना सम्भव नहीं है क्योंकि एक के पीछे सचेतन रूप से एक विश्व-दृष्टि मौजूद है और वह एक समग्र सिस्टम है, जबकि दूसरी एक पद्धति (मेथड) है जो रंगकर्म के सुदीर्घ अनुभवों की देन है, यहाँ भी सर्वहारा अवस्थिति की ओर विकासमान विश्व-दृष्टि मौजूद है, लेकिन वह सचेतन नहीं है …….आगे पढ़ें।

छायानट-वैचारिक

आइज़ेंस्ताइन का फ़िल्म-सिद्धान्त और रचनात्मक प्रयोग — अनादि चरण

सामाजिक जीवन के यथार्थ के सौन्दर्यात्मक-कलात्मक संज्ञान की समस्याओं पर द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दृष्टि से चिन्तन तथा परस्पर-विरोधी अवस्थितियों के बीच टकरावों का सिलसिला पिछली पूरी शताब्दी के दौरान लगातार चलता रहा। मार्क्‍स और एंगेल्स के दिशा-संकेतक सूत्रों पर काफ़ी कुछ लेखन और विमर्श हुआ है। प्लेखानोव, लुनाचार्स्‍की, गोर्की, वोरोव्स्की, वोरोन्स्की, राल्फ फॉक्स, कॉडवेल आदि की क्लासिकी मार्क्‍सवादी स्थापनाओं-भाष्यों से लेकर ब्रेष्ट-लूकाच विवाद, ब्रेष्ट के द्वन्द्वात्मक थिएटर और वाल्टर बेंजामिन के कला-चिन्तन और नववामपन्थी चिन्तन की विभिन्न धाराओं-उपधाराओं तक के बारे में बहुत-कुछ लिखा-पढ़ा जाता रहा है। इस पूरे चिन्तन और विमर्श के परिमाण और गुणवत्ता पर कोई निर्णय देना या सन्तोष प्रकट करना यहाँ हमारा मन्तव्य नहीं है। …….आगे पढ़ें।

संगीत-चिन्तन

सर्वहारा संगीत-रचना की समस्याएँ — गंगा प्रसाद भट्ट

सर्वहारा संगीत से यहाँ हमारा तात्पर्य उससे नहीं है जो सर्वहारा वर्ग के लोग गाते-बजाते हैं। हमारा तात्पर्य यहाँ सर्वहारा वर्ग के पक्ष में सचेत तौर पर और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ खड़ी संगीत-कला से है, ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी विश्व-दृष्टि से लैस संगीत से है। हर कला की तरह वर्ग-समाज में संगीत-कला का भी वर्ग-चरित्र होता है, वर्गीय पक्षधरता होती है। उसकी प्रतिगामी और प्रगतिशील धाराएँ होती हैं। भारत में प्रगतिशील, जनवादी, वामपन्थी सांस्कृतिक आन्दोलन में संगीत के वैचारिक पहलुओं पर लगभग नहीं के बराबर काम हुआ है। ज़्यादा से ज़्यादा, कुछ व्यावहारिक पहलुओं पर विचार-विमर्श दीखते हैं।  …….आगे पढ़ें।

रंग और रेखाएं

कूर्बे की कला और उसकी ज़मीन — रामबाबू

1855 में, पेरिस के कला-जगत के सुप्रसिद्ध, भव्य, अन्तरराष्ट्रीय आयोजन Exposition Universells की शुरुआत एक दिलचस्प बावेले से हुई। Exposition के आयोजकों ने विशाल कैनवस पर चित्रित, गुस्ताव कूर्बे की कृति ‘चित्रकार का स्टूडियो’ को प्रदर्शन के लिए स्वीकार नहीं किया। कूर्बे एक अक्खड़ विद्रोही युवा अवाँगार्द चित्रकार के रूप में तब तक ख्याति अर्जित कर चुका था। उसके अराजकतावादी, समाजवादी विचार और प्रूदों, शांपफ्लूरी, बुशों और वॉदलेयर जैसी राजनीति, पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया की ”विस्फोटक” हस्तियों से उसकी मित्रता भी बहुविख्यात थी।  …….आगे पढ़ें।

 

सृजन परिप्रेक्ष्‍य की सामग्री

गुजरात

फ़ासीवादी मुहिम का नया मुक़ाम : गुजरात — सत्यप्रकाश

गुजरात नरसंहार और ”महान भारतीय मध्यवर्ग” का फ़ासीवादी चेहरा — महताब

क्या कर सकते हैं लेखक और संस्कृतिकर्मी — कात्‍यायनी / सत्‍यम

आह मेरे लोगो ! ओ मेरे लोगो ! (गुजरात – 2002) — कात्यायनीसृजन-साम्प्रतिक

शशिप्रकाश की सात कविताएँ
द्वन्द्व । विसंगति । शिनाख़्त । कठिन समय में विचार । नींद । शिशिर-सिम्फ़नी-2000 । जीवन की ऊष्मा-गतिकी

दिनेश कुमार शुक्ल की कविता
कथा उस पार कीमार्क ट्वेन की अमर कहानी

वह शख़्स जिसने हैडलेबर्ग को भ्रष्ट कर दियासन्दर्श

समकालीन हिन्दी आलोचना: कुछ पद्धतिशास्त्रीय समस्याएँ — रामराज प्रसादअभिमत

दलित समस्या और दलित साहित्य : एक संवाद — मास्टर त्रिलोचन सिंहपरम्परा-प्रसंग

इक्कीसवीं सदी में बाल्ज़ाक — कात्यायनी / सत्यमभाषा-चिन्तन

भाषा-विज्ञान के इतिहास में मार्क्‍सवाद और वोलोशिनोव — कात्यायनी / सत्यमनान्दिकर

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट — मेसिंगकौफ़ संवाद (कुछ अंश)

ब्रेष्ट और स्तानिस्लाव्स्की साथ-साथ और आमने-सामने — सत्यव्रतछायानट-वैचारिक

आइज़ेंस्ताइन का फ़िल्म-सिद्धान्त और रचनात्मक प्रयोग — अनादि चरणसंगीत-चिन्तन

हान्स आइस्लर — मज़दूर, मज़दूर आन्दोलन और संगीत

सर्वहारा संगीत-रचना की समस्याएँ — गंगा प्रसाद भट्टरंग और रेखाएं

कूर्बे की कला और उसकी ज़मीन — रामबाबूकृति-प्रसंग

हमारे समय का यथार्थ और जगदीशचन्द्र के उपन्यास — मीनाक्षीसिने-प्रसंग

‘लगान’ और ‘ग़दर’ : हिन्दी सिनेमा की इतिहास-यात्रा 2001 — ललित सतीअन्तर्दृष्टि

सौन्दर्यीकरण के बारे में कुछ नोट्स — सत्यव्रतपरिप्रेक्ष्य

सम्‍पूर्ण अंक


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