मजदूर बिगुल के दिसंबर 2010 के अंक की सामग्री से परिचय

2010 : घपलों-घोटालों का घटाटोप
भारतीय पूँजीवादी जनतन्त्र का भ्रष्ट-पतित-गन्दा-नंगा चेहरा
नेता, अफसर, जज, मीडियाकर्मी – लूटपाट, कमीशनख़ोरी में कोई पीछे नहीं

2010 के पूरे वर्ष में कश्मीर में युवा, बच्चे और स्त्रियाँ तक सड़कों पर सेना के विरुध्द मोर्चा लेते रहे। महँगाई ने नये कीर्तिमान स्थापित किये। उबरने की लाख कोशिशों के बावजूद वैश्विक मन्दी से त्रस्त साम्राज्यवादी देश भारत की प्राकृतिक सम्पदा और श्रम सम्पदा को और अधिक निचोड़ने के मकसद से पूँजी लगाने और माल बेचने के लिए सौदेबाज़ी और होड़ करते रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा लाव-लश्कर सहित आये और भारत को ”उभर चुकी ताकत” बता गये। आगे पढ़ें…

उँगलियाँ कटाकर मालिक की तिजोरी भर रहे हैं आई.ई.डी. के मज़दूर
पिछले 8 वर्षों में क़रीब तीन सौ मज़दूरों की उँगलियाँ कटीं
सीटू ने फिर किया मज़दूरों के साथ घिनौना विश्वासघात

नोएडा। यहाँ के लालकुँआ इलाके में सैमटेल व इण्टरनेशनल इलेक्ट्रो डिवाइसेज़ लिमिटेड नाम की दो कम्पनियाँ हैं। इनके मालिक कोड़ा बन्धु हैं। सुधीर कोड़ा बड़े भाई का नाम है और वह इण्टरनेशनल इलेक्ट्रो डिवाइसेज़ का मालिक है। सैमटेल कम्प्यूटर के मॉनीटर आदि बनाने का काम करती है और इलेक्ट्रो डिवाइसेज़ उसे पुर्ज़े आपूर्ति करती है। इण्टरनेशनल इलेक्ट्रो डिवाइसेज़ (आई.ई.डी.) और सैमटेल के कारख़ानों के तहत कोड़ा बन्धुओं ने भारी मात्रा में ज़मीन कब्ज़ा रखी है। इन दोनों कारख़ानों के करीब 5 गेट हैं और इनका बाहर से पूरा पैदल चक्कर लगाने में करीब 3 घण्टे लगते हैं। आगे पढ़ें…

दिल्ली में मज़दूर माँग-पत्रक आन्दोलन-2011 क़ी शुरुआत
श्रमिक अधिकारों के प्रति मज़दूरों को जागरूक करने के लिए प्रचार से आगाज़

दिल्ली। राजधानी के औद्योगिक इलाकों करावल नगर, झिलमिल, बादली सहित अन्य मज़दूर बस्तियों में मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन-2011 चलाया जा रहा है। मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन के कार्यकर्ता मज़दूर बस्तियों में नुक्कड़ सभाएँ, पर्चा वितरण करते हुए श्रमिक अधिकारों के प्रति मज़दूरों में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। आगे पढ़ें…

लक्ष्मीनगर हादसा : पूँजीवादी मशीनरी की बलि चढ़े ग़रीब मज़दूर
मुनाफा! हर हाल में! हर कीमत पर! मानव जीवन की कीमत पर। नैतिकता की कीमत पर। नियमों और कानूनों की कीमत पर। यही मूल मन्त्र है इस मुनाफाख़ोर आदमख़ोर व्यवस्था के जीवित रहने का। इसलिए अपने आपको ज़िन्दा बचाये रखने के लिए यह व्यवस्था रोज़ बेगुनाह लोगों और मासूम बच्चों की बलि चढ़ाती है। इस बार इसने निशाना बनाया पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर के ललिता पार्क स्थित उस पाँच मंज़िला इमारत में रहने वाले ग़रीब मज़दूर परिवारों को जो देश के अलग-अलग हिस्सों से काम की तलाश में दिल्ली आये थे। इमारत के गिरने से लगभग 70 लोगों की मौत हो गयी और 120 से अधिक लोग घायल हो गये जिनमें कई महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। आगे पढ़ें…

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 2
कार्य-दिवस का प्रश्न मज़दूर वर्ग के लिए एक महत्त्‍वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न है, महज़ आर्थिक नहीं
हमारा तात्कालिक नारा : 8 घण्टे के कार्य-दिवस के कानून को लागू करो!
दूरगामी संघर्ष का नारा है : काम के घण्टे 6 करो!

पिछले अंक में हमने ‘माँगपत्रक आन्दोलन-2011′ क़ी शुरुआत के साथ ‘मज़दूर बिगुल’ में इस आन्दोलन का परिचय देने के साथ माँगपत्रक शिक्षणमाला की शुरुआत की थी। इस शिक्षणमाला का लक्ष्य है मज़दूर साथियों को माँगपत्रक आन्दोलन की माँगों के इतिहास और महत्त्‍व से वाकिफ कराना। इन सभी माँगों में निस्सन्देह आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग सबसे महत्त्‍वपूर्ण है। यही कारण है कि माँगपत्रक-2011 क़ी पहली माँग काम के घण्टों से जुड़ी हुई है। आगे पढ़ें…

कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (पाँचवीं किस्त)
माउण्टबेटन योजना, विभाजन और आज़ादी
नौसेना विद्रोह, 1947 के देशव्यापी मज़दूर उभार, तेलंगाना-तेभागा-पुन्नप्रा वायलार (विशेषकर तेलंगाना) किसान संघर्षों और साम्राज्यवाद-विरोधी देशव्यापी जनउभार की सम्भावनाओं ने किसी क्रान्तिकारी राजनीतिक विकल्प को भले ही जन्म नहीं दिया, लेकिन भारतीय बुर्जुआ वर्ग और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों – दोनों को ही आतंकित ज़रूर कर दिया। मुख्यत: इसी आतंक के चलते भयंकर साम्प्रदायिक रक्तपात और बँटवारे के साथ सत्ता का ”शान्तिपूर्ण” हस्तान्तरण सम्भव हो सका। उस दौर के शासकीय दस्तावेज़ों (जैसे नौकरशाह वी.पी. मेनन द्वारा वायसराय वेवेल को भेजी गयी रिपोर्टें) से पता चलता है कि कम्युनिस्ट ख़तरे से अंग्रेज़ और कांग्रेस दोनों ही आतंकित थे। आगे पढ़ें…


पंजाब सरकार ने बनाये दो ख़तरनाक काले कानून : पूँजीवादी हुक्मरानों को सता रहा है जनान्दोलनों का डर
देश की पूँजीवादी व्यवस्था के लिए अब जनतन्त्र-जनतन्त्र का खेल खेलना कितना कठिन होता जा रहा है इसका अन्दाज़ा पंजाब विधानसभा में अक्तूबर में पास किये गये दो बेहद ख़तरनाक कानूनों से लगाया जा सकता है। ये कानून जनता की अन्याय के ख़िलाफ आवाज़ बुलन्द करने की रही सही आज़ादी पर भी प्रतिबन्ध लगाने की एक कोशिश है। साफ दिखायी देता है कि देश के पूँजीवादी हुक्मरान अब जनता को कुछ भी बेहतर देने के काबिल नहीं रह गये हैं। जनान्दोलनों का भूत उनका हर वक्त पीछा कर रहा है। आइये, ज़रा ख़ुद ही अन्दाज़ा लगाइये कि देश के हुक्मरान आने वाले दिनों से कितने भयाक्रान्त हैं। आगे पढ़ें… 

यू.आई.डी. :घ्जनहित नहीं, शासक वर्ग के डर का नतीजा
भारत सरकार की यूनियन कैबिनेट की मीटिंग में इस वर्ष पहली अक्तूबर को यूनीक आईडेण्टीफिकेशन अथॉरिटी आफ इण्डिया का गठन किया गया। इसके तहत भारत सरकार हर नागरिक के लिए एक अनन्य पहचान कार्ड (यूनीक आइडेंटिटी कार्ड) बनायेगी। यह कार्ड इलेक्ट्रॉनिक होंगे। इनके लिए नागरिकों की निजी जानकारियाँ भारत सरकार की उपरोक्त संस्था के पास इकट्ठा की जायेंगी। इस अभियान का नाम ‘आधार’ रखा गया है। भारत सरकार झूठे दावे कर रही है कि देश के नागरिकों के बारे में सारी जानकारियाँ एक जगह एकत्रित करने और उन्हें यू.आई.डी. जारी करने के अनेक फायदे हैं। लेकिन सरकार का यह अभियान नागरिकों के निजी जीवन के संवेदनशील पक्षों में दख़लअन्दाज़ी की ख़तरनाक साज़िश है। आगे पढ़ें…

अयोध्‍या फ़ैसला : मज़दूर वर्ग का नज़रिया (अन्तिम किस्त)
फैसले का सर्वहारा विश्लेषण
अब इस फैसले पर भी एक निगाह डाल ली जाये। इस फैसले पर पूँजीवादी मीडिया लोटपोट हो गया है। वह इसे भारतीय सेक्युलरिज्म और लोकतन्त्र की विजय बतला रहा है। ज़ाहिर है, पूँजीवादी मीडिया अपना फर्ज़ अदा कर रहा है – पूँजीवाद के पक्ष में जनता की आम राय बना रहा है। अब यह एक दीगर बात है कि वह जो बोल रहा है, सच्चाई उसके बिल्कुल विपरीत है! चूँकि फैसले में विवादित भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बाँटकर तीन पक्षों को देने की बात की गयी है, इसलिए इसे एक ऐसे फैसले के रूप में देखा जा रहा है जो साम्प्रदायिक भाईचारे को बनाये रखने के लिए दिया गया है और यह भी कहा जा रहा है कि इससे धार्मिक वैमनस्य का ख़ात्मा होगा। आगे पढ़ें…

कश्मीर समस्या का चरित्र, इतिहास और समाधान : समाजवादी राज्य में ही सम्भव है कश्मीर या अन्य किसी भी राष्ट्रीयता का समाधान
लम्बे समय तक कश्मीर अराजकता की स्थिति में रहने के बाद अपेक्षाकृत सामान्यता की स्थिति में लौटता हुआ नज़र आ रहा है। लेकिन इसका अर्थ कोई भी यह नहीं लगा रहा है कि कश्मीर प्रश्न का समाधान हो गया है। सभी जानते हैं कि एक ज्वार अभी उठकर ठण्डा पड़ा है; जनता लगभग साढ़े तीन महीनों तक सड़कों पर रहने के बाद अब सुस्ता रही है; लेकिन इस उभार ने जो सवाल उठाये थे, वे अभी भी अपनी जगह पर हैं। 1954 से लेकर आज तक ऐसा अनगिनत बार हुआ है कि भारतीय राज्य के दमन की मुख़ालफत करने के लिए कश्मीर की आम जनता सड़कों पर उतरती रही है। कभी सेना के दमन के बूते, कभी सड़कों पर थकाकर तो कभी कूटनीति के ज़रिये जनता के उभार को शान्त करने की कोशिश की जाती रही है। आगे पढ़ें…

संघर्ष की नयी राहें तलाशते बरगदवाँ के मज़दूर
गोरखपुर। किसी भी किस्म के श्रम कानूनों के लागू न होने और काम की बेहद बुरी दशाओं से त्रस्त बरगदवाँ औद्योगिक क्षेत्र के कई कारख़ाना मज़दूरों ने आज से करीब डेढ़ वर्ष पहले संगठित होने की शुरुआत की थी। अंकुर उद्योग लि., बी.एन. डायर्स कपड़ा मिल, बी. एन. डायर्स धागा मिल, माडर्न लैमिनेटर, माडर्न पैकेजिंग, लक्ष्मी साइकिल इण्डस्ट्रीज के मज़दूरों ने अलग-अलग और ज़रूरत पड़ने पर संयुक्त प्रतिरोध का रास्ता अपनाया। आन्दोलन के ज़बरदस्त दबाव के चलते मिल मालिकों को झुकना पड़ा और मज़दूरों को कुछ कानूनी अधिकार भी हासिल हुए। समय-समय पर फैक्टरी मालिकों ने मज़दूरों से लिखित समझौते किये। आगे पढ़ें…

बिल गेट्स और वॉरेन बुफे की ‘गिविंग प्लेज’ : लूटो-भकोसो और झूठन आम जनता के ”हित” में दान कर दो
अरबपतियों को याद आयी जनता! या पूँजीवाद की डगमगाती नैया?

हाल ही में विश्व के दो सबसे अमीर व्यक्तियों – बिल गेट्स और वॉरेन बुफे ने अपनी-अपनी निजी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा धार्मार्थ कार्यों के लिए दान करने की घोषणा की और उसके बाद से वे दुनियाभर के अरबपतियों को अपनी-अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति का आधा-आधा हिस्सा देने के लिए मना रहे हैं। उन्होंने अपने अभियान का नाम रखा है ‘गिविंग प्लेज’ यानी ‘दान करने की सौगन्ध’! नवीनतम सूचना के अनुसार वे 40 अरबपतियों को मनाने में कामयाब हो चुके हैं और इससे 6,000 लाख डॉलर की राशि ग़रीब देशों में एन.जी.ओ. और सुधारवादी संस्थाओं को मिलने की उम्मीद है। आगे पढ़ें…

एलाइड निप्पोन की घटना
एक बार फिर फैक्टरी कारख़ानों में मज़दूरों का घुटता आक्रोश सतह पर आया
प्रबन्धन की गुण्डागर्दी की अनदेखी कर मज़दूरों पर एकतरफ़ा पुलिसिया कार्रवाई

साहिबाबाद। विगत 13 नवम्बर को साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र साइट-4 के भूखण्ड संख्या ए-12 पर स्थित एलाइड निप्पोन लिमिटेड के फैक्टरी परिसर में मैनेजमेण्ट के गुण्डों ने या यूँ कहें कि मैनेजमेण्ट रूपी गुण्डों ने मज़दूरों पर फायरिंग की। बार-बार की तरह मज़दूरों को डराने-धमकाने की इस क्रिया ने इस बार फिर ग्रेज़ियानो की घटना को दोहराने का काम किया। इस आपसी झड़प ने अन्तत: ख़ूनी संघर्ष का रूप अख्तियार कर लिया जिसमें 6 मज़दूर भी घायल हुए, जिनमें से 2 की हालत बेहद गम्भीर थी। वहीं कम्पनी का मैनेजर भी चोट का शिकार हुआ और बाद में उसकी मौत हो गयी। पुलिसिया विभाग ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए 8 गिरफ्तार मज़दूरों समेत 377 के ख़िलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कर लिया।

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