महामंदी जिसे अब सुपर महामंदी कहा जा रहा है, से जूझ रहे विश्व पूंजीवाद और साम्राज्यवाद ने मेहनतकश जनता के राजनीतिक और आर्थिक (व्यक्तिगत और सामूहिक) हितों के विरुद्ध चलाये गए दमनचक्र में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. परन्तु विश्वभर से मेहनतकश अवाम और विशेषतया यूरोप के लोगों द्वारा पूंजीवादी संस्थापन के विरुद्ध आक्रोश की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है. जहाँ तक भारत का संबंध है, संकट यहाँ भी गहराता जा रहा है. न केवल बुर्जुआ जूनियर पार्टनर का बल्कि उन लोगों का भी जो मेहनतकश लोगों के हितों और जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ने का दम भरते हैं. फ़िलहाल इस स्थिति को जनतांत्रिक मूल्यों और पूर्व में जीते गए मेहनतकश लोगों के हितों की रक्षा के लिए लड़ना, कहना ही उचित होगा क्योंकि क्रांतिकारी शक्तियां के संकट और बिखराव के चलते नए अधिकारों की जीत की कल्पना करना बेमानी होगा. इस समय का संकट यह है कि कोई चीज मर रही है लेकिन मर नहीं रही तथा जिसने जन्म लेना है वह जन्म नहीं ले रहा है. लेकिन संकेत तो यही कहते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये, मरनासन पूंजीवाद की मौत अटल है. बिनायक सेन जैसे मानवीय मूल्यों के लिए लड़नेवाले व्यक्ति को सजा देकर पूंजीवादी संस्थापन अपनी कमजोरियों पर काबू नहीं पा सकेगा.
बिनायक सेन को देशद्रोही करार देकर उन्हें उम्रकैद की सजा निश्चित रूप से उन लोगों के लिए चुनौती है जो जनवादी मूल्यों और देश की मेहनतकश जनता के पक्ष में खड़ा होने का दम भरते रहे हैं या रहेंगे. शहीद भगत सिंह विचारमंच उन सभी लोगों की चिंता में शरीक है जिन्हें अदालत के इस फैसले से आघात पहुंचा है. निश्चय ही, भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली के चरित्र का दिन प्रतिदिन जनवाद विरोधी और मेहनतकश विरोधी होते जाना चिंतनीय है. परन्तु अगर मौजूदा परस्थितियों में, पूंजीवाद ने अपने तर्कानुसार विकास (?) करना है या जीवित रहना है, तो यह मेहनतकश लोगों द्वारा जीते गए जनतांत्रिक मूल्यों के विनाश के बिना संभव ही नहीं है. अगर भविष्य में, बिनायक सेन जैसे लोगों या जनतांत्रिक सगठनों का निर्दयतापूर्ण दमन होता है, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए. वैसे उन लोगों का जो मेहनतकश जनता के खेमे में खड़े होते हैं, का दमन, पूंजीपति वर्ग की सेवा में हाजिर राज्य की नज़र में, अनुचित नहीं होता क्योंकि केवल इस तरीके से ही वह शोषक वर्ग की सच्ची सेवा करकर अपना फर्ज निभा सकता है. नया बस इतना ही हुआ है कि कुछ लोग जो वर्गीय समाज में राज्य और उसके संघटकों को वर्गों से ऊपर पवित्र और निष्पक्ष चीज मानते रहे हैं, उनका ज्यादा नहीं तो थोडा सा भ्रम तो दूर हुआ ही है.
.
::
क्रांतिकारी ऑडियो
मार्क्स के 'मूल्य का नियम' पर आधारित हिंदी डब फ़िल्में
.
.
.
.
..
:
;
.
.
.
डेविड हार्वे के साथ मार्क्स की 'पूँजी' का पठन
aage bro
इस विडियो में बुर्जुआ मिडिया के पत्रकार अराजकतावादियों के अंतर्राष्ट्रीय अंतर्जाल के सक्रीय होने का कारण वर्तमान महामंदी में देखते हैं. बेशक यह सही है क्योंकि वर्तमान पूंजीवादी अर्थव्यस्था के पास मानवता को सकरात्मक देने के लिए कुछ बचा भी तो नहीं है. साम्राज्यवाद के इस नवउदारीकरण फेज के दौरान पैदा हुई बेरोजगारी और निराशा ने वह जमीन पैदा की है जिससे आतंकवाद, चाहे वह वामपंथी या घोर प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी , यह राज्य की हिंसा के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ही पनपा है. पाठकों से हम दीपायन बोस के इस विस्तृत आलेख ‘आतंकवाद के बारे में विभ्रम और यर्थाथ’ के पठन का आग्रह करेंगे.
बिनायक सेन को देशद्रोही करार देकर उन्हें उम्रकैद की सजा निश्चित रूप से उन लोगों के लिए चुनौती है जो जनवादी मूल्यों और देश की मेहनतकश जनता के पक्ष में खड़ा होने का दम भरते रहे हैं या रहेंगे….
नब्बे के दशक में शुरू हुई उदारीकरण की नीतियों से पहले भारत की विकास दर लगभग तीन-साढ़े तीन प्रतिशत हुआ करती थी जबकि रोजगार दो-अढाई प्रतिशत की दर से बढ़ रहे थे. लेकिन अब विकास दर आठ-नौ प्रतिशत है जबकि रोजगार डेढ़ प्रतिशत की दर से भी कम पैदा हो रहे. यही नहीं कार्पोरेट घरानों के हितों के लिए सरकार वह सब करने के लिए तैयार है जिससे छोटे मालिकों की जमीन-जायदाद को हडप किया जा सके. पूंजीपतियों के लिए अधिकृत की गयी भूमि के विरुद्ध, बेशक इन मालिकों की लड़ाई भी ज्यादा से ज्यादा मूल्य हासिल करने की होती है लेकिन इस हासिल किये गए मूल्य का पुनर्निवेश उनके लिए सिरदर्द बन जाता है क्योंकि स्वयं पूंजीपति भी अपने सरप्लस मूल्य का नब्बे प्रतिशत गैर उत्पादक कार्यों में लगा रहे हैं. तो इस स्थिति में यह रकम उनमें से अधिकतर लोगों को कंगाली में जाने से रोक नहीं पायेगी.
आदिवासी जहाँ रहते हैं वहां वे सभी संसाधन है जिनका दोहन इस आठ-नौ प्रतिशत की विकास दर को बनाये रखने के लिए जरूरी हैं. उनके लिए कार्य करनेवाले माओवादियों की नियत भले ही कितनी साफ़ हो लेकिन, आदिवासियों की पिछड़ी चेतना द्वारा आप इक्कीसवीं सदी का इन्कलाब नहीं कर सकते. मुझे नहीं लगता की माओवादी समाजवादी क्रांति के पक्ष में हैं. वे तो अभी चीन की नव जनवादी क्रांति के ही सपने लेते हैं. वे भूमि सुधार और कार्पोरेट घरानों से इस दोहन से आदिवासियों के लिए कुछ हिस्सा चाहते हैं. उनका प्रोग्राम बस इतना ही है. जबकि भारत कब का इससे आगे बढ़कर एक पूंजीवादी देश बन चुका है जहाँ समाजवादी क्रांति ही संभव है. नए पैदा हुए शहरी और ग्रामीण सर्वहारा में कार्य किया जा सकता है. लेकिन हमने तो पंजाब और हरयाणा में संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों के उन आम कम्युनिस्ट काडर को देखा है जो किसान वर्ग से है और जिनमें से कई तो २० लाख से अधिक तक का ठेका/लगान तक वसूल करते हैं. क्या २० रूपये से कम पर गुजारा करनेवाली ७७ प्रतिशत आबादी इनसे लगाव रख सकती है ? अनुभव और आंकड़े तो यही कहते हैं की इन पार्टियों से नया पैदा हुआ सर्वहारा वर्ग अत्यंत घृणा करता है.
इस गाँठ/ग्रंथि से छुटकारा पाना ज्यादातर कम्युनिस्टों को मुश्किल लगता है. वैसे कम्युनिस्ट अपने आपको सबसे अधिक प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच के धनि मानते हैं, लेकिन अपने-अपने चौखटों में कठमुल्लाओं की भांति कैद रहते हैं. उन्हें होलीवूड की फिल्म “मेट्रिक्स’ देखनी चाहिए जोकि हिंदी में भी उपलब्ध है.