मूल्य का नियम 3 ‘मिट्टी की कचौड़ी’

इस पोस्ट में फ़िलहाल विडियो और उसके टेक्स्ट का प्रथम भाग शामिल है. कुछ दिनों के बाद, दूसरे भाग का विडियो और टेक्स्ट इस पोस्ट में शामिल कर इसे अपडेट कर दिया जायेगा. अलग से नयी पोस्ट नहीं लिखी जाएगी…संपा.

मार्क्सवादी सिद्धांत के चेहरे को एक हौवा सता रहा है. ‘मिटटी की कचौड़ी’ का हौवा. यही है वह केन्द्रीय पहेली जिसके लिए मार्क्स ने अपनी महान रचना ‘मिटटी की कचौड़ी’ लिखी. तभी से सभी मतों के मार्क्सवादी सिद्धान्तकारों को यह हौवा सता रहा है. इस विध्वंसकारी सैद्धांतिक समस्या की रौशनी में, कैसे मार्क्सवादियों का सिद्धांत चल सकता है ?

उपहास…

अगर इन्टरनेट पर आपको मार्क्स के ‘मूल्य का सिद्धांत’ पढने का समय मिले, तो शायद आपकी भेंट इस “‘मिटटी की कचौड़ी’  के  तर्क द्वारा आलोचना” करनेवाले गंवारू बहानेबाजों के कुछ संस्करणों से हो . ‘मिटटी की कचौड़ी’ का तर्क उन अग्रवर्ती आलोचकों के तर्कों से भी मिलता-जुलता है जो मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ के बारे में कुछ नहीं जानते.  उपहासपूर्ण गंवारू तर्क जिसका मार्क्स से कुछ भी लेना-देना नहीं होता,  प्रस्तुत करते हुए वे “विध्वंसकारी” “शान” और “नैतिक नाराजगी” द्वारा इसे पटकनी देते हैं और कुछ तो स्टालिनवाद का किनारा छू लेते हैं. ‘मिटटी की कचौड़ी’ का तर्क कुछ इस तरह चलता है :

मार्क्स का दावा था कि यह श्रम है जो सभी जिंसों को मूल्य प्रदान करता है. लेकिन क्या होगा अगर मैं ‘मिटटी की कचौड़ी’ बना लूं. श्रम का उत्पाद होने के बावजूद इसे कोई नहीं खरीदेगा. इसमें कोई मूल्य नहीं है. सो हा.  ले लो उस कार्ल मार्क्स को.

इस तर्क के साथ समस्या यह है कि मार्क्स पूर्णतया स्पष्ट थे कि श्रम द्वारा मूल्य सृजन के लिए उसे उपयोगी श्रम होना जरूरी है. हालाँकि वे ऐसा नहीं सोचते थे कि इस उपयोगिता से ही मूल्य सृजित हो जाता है. सदियों से श्रम उपयोगी कार्य करती रही है. सभी समाजों का निर्माण उपयोगी श्रम से होता है. मार्क्स इसे इसलिए उपयोगी श्रम कहते हैं क्योंकि यह “सामाजिक श्रम” बन जाती है. एक समाज से दूसरे समाज में इस सामाजिक श्रम का संगठन भिन्नता लिए होता है. पूंजीवादी समाज में, इस सामाजिक श्रम का संगठन विनिमय के द्वारा होता है. श्रम के उत्पादों को मंडी-मूल्य प्रदान कर दिए जाते हैं और इन मूल्यों में उतार-चढ़ाव से सामाजिक श्रम प्रक्रिया संयोजित होती है. इस प्रकार का सामाजिक श्रम संगठन पूंजीवाद के लिए अद्वितीय है जिसमें हर तरह के वे अद्वितीय गुण हैं जो सामाजिक श्रम के अन्य रूपों में नहीं हैं. श्रम के उपयोगी होने से पूंजीवाद विशेष नहीं बन जाता. वह मूल्य है. इसलिए, उपयोगिता ऐसी चीज नहीं है जिसके बारे में बोलते हुए मार्क्स दिलचस्पी ले रहे हों. वह मूल्य है. .

विडियो 4 में हम देखेंगे कि जिन्स में मौजूद मूल्य का, उपयोगिता क्यों नहीं वर्णन कर सकती. तब तक हम इस और अधिक मूलभूत प्रश्न की पड़ताल करेंगे. जिन्स विनिमय का रूप लेने के लिए उपयोग मूल्य की क्या भूमिका है ?

समाज क्या है ?

मार्क्स के लिए, मनुष्यों और पशुओं के बीच कुंजीवत भिन्नता उस तरीके में है जिसमें वे अपने संसारों का निर्माण करते हैं. मनुष्य अपनी विकासमूलक किस्मत, सदियों तक बारम्बार उसी प्रथा के स्वरूपों को दोहरानेवाले गुलाम नहीं है. बल्कि  सक्रियता से उस संसार को आकार देते हैं जिसमें वे रहते हैं.  मानव श्रम का एक निश्चित सृजनात्मक पक्ष है – कार्य करने से पहले अपने दिमाग में अपने  कार्य के उत्पाद की कल्पना.

” लेकिन सर्वोतम मधुमक्खियों से सबसे बेकार शिल्पकार को जो बात भिन्न करती है, वह यह कि शिल्पकार अपनी संरचना का हकीकत में निर्माण करने से पहले, उसे कल्पना में खड़ा करता है.” कार्ल मार्क्स

यह जगत जिसका हम निर्माण करते हैं, हमारे द्वारा जिए गए अनुभवों के रूप हैं, हम स्वयं की सृजन के उत्पादों के संबंध में रहते, खाते, पहनते और सोचते हैं. हमारे सामाजिक संबंधों की संरचना, हमारा सांस्कृतिक और पारवारिक समूहों के साथ संबंध से लेकर उत्पादन के संगठन तक, हमारे जीवन के संसार के विचार तक, मानव श्रम की सृजनात्मक शक्ति द्वारा यंत्रचालित  जगत की रचना होती है. फिर भी, हमारी रचना का यह जगत, लौटकर हमें प्रभावित करता है. यह हमारी इच्छाओं और इन इच्छाओं को हासिल करनेवाले हमारे साधनों को स्वरूप देता है. अधिकतर मुख्यधारा की आर्थिक सोच में मानवीय इच्छाएँ और इन इच्छाओं को हासिल करने के साधनों को सार्वभौमिक और असामयिक चीजें माना जाता है. मार्क्स इसके विपरीत कहते हैं : हमारी इच्छाओं और हमारी इन इच्छाओं की वस्तुओं की प्राप्ति के लिए जो कुछ  हम करते हैं, वह वैसे ही बदल जाता है जैसे हमारे समाज का संगठन बदल जाता है. इस अर्थ में, ” मानव-जन अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं, पर अपने मनचाये ढंग से नहीं.” ( कार्ल मार्क्स, लुई बोनापार्ट की अठारवीं ब्रूमेर )

विभिन्न समय और विभिन्न स्थानों पर मानव की सक्रियता का यह संगठन मूलत: भिन्न रहा है. तकनिकी विकास का स्तर, उत्पादन का संगठन, वर्गों का संगठन और विश्व के बारेमें साझी अवधारणाएँ, समयानुसार सभी मूलत: बदल गए हैं. मार्क्स की दिलचस्पी इन सब में थी कि उत्पादन की इन अलग-अलग विधियों और उत्पादन का संगठन के ढंग से समाज के अन्य पक्षों पर क्या प्रभाव पड़ता है . मार्क्स इसकी पड़ताल कर रहे थे कि उत्पादन का संगठन मूलत: समाज के बारे में क्या कहता है.

इसका अर्थ है कि मार्क्स की केवल श्रम में ही दिलचस्पी न थी. उनकी दिलचस्पी सामाजिक-श्रम, श्रम जो उत्पादन की विधि का हिस्सा है, श्रम जिससे समाज निर्मित होता है, में थी. अनुपयोगी श्रम जिससे ‘मिट्टी की कचौड़ी’ बनती है, सामाजिक श्रम नहीं है. किसी विशेष ऐतिहासिक उत्पादन की विधि पर नज़र डालने पर, पहला कदम,  उस समाज में वैयक्तिक निजी श्रम कैसे सामाजिक श्रम बन जाती है, की पड़ताल करना है.

अगर आप मध्ययुगीन खेत के एक टुकड़े पर अपने परिवार समेत काम करते, तो आप प्रत्यक्षतः अपने लिए श्रम करते. किसी तरह का कोई रहस्य न होता कि श्रम जो आप करते, उसका  आपके सामाजिक समूह के लिए उपयोग है या फिर उपयुक्त कार्य के लिए उपयुक्त श्रम की मात्रा खर्च की जा रही है. अपने खेत में की जानेवाली निजी श्रम प्रत्यक्ष सामाजिक होती.

पूंजीवादी समाज में हम स्वयं के उपयोग के लिए चीजे उत्पादित नहीं करते. उनका उत्पादन हम मंडी में विनिमय के लिए करते हैं. उत्पादित होनेवाली चीजों की उपयोगिता में, हमारी कोई दिलचस्पी नहीं होती. हमें विनिमय से मिलने वाले धन से ही दिलचस्पी होती है. तब हम उस धन के साथ मंडी में प्रवेश करते हैं ताकि हम अपनी जरूरत की, निजी उपयोग की, वस्तुएं खरीद सकें. जिन्स का उत्पादन और इसका उपयोग देश और काल द्वारा अलग कर दिए जाते हैं . वे मूल्य के द्वारा अलग कर दिए जाते हैं. मूल्य के द्वारा ही उनका संपर्क हो जाता है. हमारी निजी श्रम को सामाजिक श्रम में बदलने के लिए जरूरी है कि वह पहले मूल्य का रूप धारण करे.

प्राक-पूंजीवादी समाजों से यह बिलकुल अलग तरह की सामाजिक श्रम है. प्रत्यक्षत: सामाजिक होने की अपेक्षा पूंजीवादी श्रम परोक्षत: सामाजिक है. लोग प्रत्यक्षत: निर्णय  नहीं करते कि वे किसका उत्पादन करें बल्कि ये निर्णय  मंडी-संकेतों के उतार-चढाव, क्रेताओं और विक्रेताओं के सतत आगे-पीछे बढ़ने से लिए जाते हैं. परन्तु मंडी के ये संकेत कोई स्वायत शक्ति नहीं होती. ये प्रथक करोड़ों उत्पादकों की वैयक्तिक श्रमों की औसत से बने हैं. उत्पादन और उपभोग के इस अलगाव का अर्थ यह है कि हमारी श्रम का वैयक्तिक मूल्य और सामाजिक मूल्य, दोनों है. वैयक्तिक मूल्य कार्य की वह मात्रा है जो किसी बस्तु को निर्मित करने में वास्तव में लगती है. सामाजिक मूल्य, मूल्य की वह वास्तविक मात्रा है जिसपर जिन्स, मंडी में प्रवेश करने पर बिकती है

क्योंकि मंडी द्वारा उत्पादकों को एक-दूसरे से अलग कर दिया जाता है, क्योंकि उत्पादन पर हमारा सामूहिक नियंत्रण नहीं होता, हमारे पास निश्चित रूप से, यह जानने कि विधि नहीं होती कि हमारे कितने और किस तरह के श्रम की समाज को आवश्यकता है. हम नहीं जानते कि हमारे उत्पाद की कितनी मांग होगी. हम नहीं जानते कि अन्य उत्पादक उत्पाद की कितनी मात्रा पैदा कर रहे हैं. इन बातों का हमें कोई अंदाजा नहीं होता. हमें तभी पता चलता है जब हमारी श्रम के उत्पाद मंडी में अन्य सभी उत्पादकों के उत्पादों से टकराते हैं. इसका अर्थ है कि वैयक्तिक श्रम, किसी जिन्स के उत्पादन में खर्च किसी व्यक्ति के समय की मात्रा, और सामाजिक श्रम, समाज द्वारा इसपर जरूरी समय की मात्रा, में फर्क हो सकता है.

अगर वैयक्तिक मूल्य और सामाजिक मूल्य भिन्न होते हैं तो इसका अर्थ क्या है ? कुछ लोग सोचते हैं कि मार्क्स का मानना था कि वैयक्तिक मूल्य को सामाजिक मूल्य के बराबर होना पड़ता है, यानिकी अगर सैंडविच बनाने में मेरे १५ घंटे खर्च हों, तो यह सैंडविच का मूल्य होगा. परन्तु मार्क्स इस सब के लिए बहस नहीं करते. मार्क्स सिद्ध करना चाहते थे कि किस तरह मंडी में, वैयक्तिक श्रम सामाजिक श्रम बन जाती है.

उत्पादन की अन्य विधियों जिनमें सीधा उपयोग के लिए श्रम किया जाता है, के विपरीत पूंजीवादी समाज में हम मूल्य के लिए श्रम करते हैं. हालाँकि समाज द्वारा अब भी हमारे उत्पादों का उपयोग जरूरी होता है. न तो हम सभी एक ही वस्तु बना सकते और न ही कोई बेकार वस्तु. श्रम द्वारा सही अनुपातों में सही कार्यों का विभाजन होना चाहिए. मूल्य रुपी तंत्र से यह संभव होता है क्योंकि वैयक्तिक श्रमों के मध्य केवल मूल्य ही संपर्क है. मार्क्स बताना चाहते थे कि  किस तरह अपने नियंत्रिक बल द्वारा,  मूल्य वैयक्तिक श्रम को सामाजिक श्रम में बदल देता है.

तथ्य कि हम अपनी वैयक्तिक श्रम के सामाजिक मूल्य को मंडी में पाते हैं, इससे भ्रम होता है कि मंडी स्वयं मूल्य पैदा कर रही है. हम अपनी श्रम की चीजों को मंडी में लाते हैं और यहाँ वे धन में बदल जाती हैं जिससे ऐसा लगता है कि क्रेताओं और विक्रेताओं के मध्य वैयक्तिक निर्णयों से ये धन-मूल्य पैदा हो जाते हैं. जिस लल्लो पच्चो द्वारा ‘ मिटटी की कचौड़ी’ के तर्क को घुसेड दिया जाता है: वह यह कि जिन्स की उपयोगिता का वैयक्तिक मूल्यांकन उसके मूल्य को निर्धारित करता है न कि वह श्रम जो इस पर खर्च होती है. यद्यपि यह भ्रम है, हमारी श्रम के परोक्षत: सामाजिक होने की हकीकत से उपजी अंधभक्ति.

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