30. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव
की व्याख्यात्मक टिप्पणियां
“वर्ग विरोध पर आधारित समाज में शोषित वर्ग अनिवार्यत: विद्यमान रहता है. इसलिए शोषित वर्ग की मुक्ति से नए समाज का निर्माण होता है. शोषित वर्ग की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि विद्यमान उत्पादक शक्तियों और प्रभावी सामाजिक सम्बन्ध परस्पर अनुकूल न हों. उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी वर्ग स्वयं सर्वाधिक ताकतवर उत्पादक शक्ति बन जाता है. क्रांतिकारी तत्त्वों के एक वर्ग के रूप में संघठन के लिए आवश्यक है कि पुराने समाज में समस्त उत्पादक शक्तियों का हर सम्भव विकास वास्तव में पूरा हो गया हो. तब क्या हम इस विचार को लें उडे कि पूर्व समाज के ध्वंस से दूसरे वर्ग का प्रभुत्व स्थापित हो जायेगा? कि इस नए प्रभुत्व की परिणति एक नयी राजनीतिक सत्ता की स्थापना में होगी? बिलकुल नहीं. मेहनतकश वर्ग की मुक्ति की यह अनिवार्य शर्त है कि समस्त वर्गों का खत्म हो जाये. पूर्व इतिहास में इसका सटीक उदाहरण मिलता है. राज्य से समस्त वर्गों, समस्त श्रेणियों के उन्मूलन से ही तीसरे वर्ग यानी बुर्जुआ वर्ग की मुक्ति का सवाल हल हुआ.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137)
सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र के प्रश्न पर आगे की टिपण्णी (42) में और अधिक विचार किया जायेगा. यहाँ पर पाठकों को मात्र यह याद दिलाने की ज़रुरत है कि घोषणापत्र के रचयिताओं ने ‘राष्ट्रीय’ शब्द का प्रयोग शासकीय और राज्यक्षेत्र के अर्थ में किया था. जब वे वर्ग संघर्ष के “मुख्यतया राष्ट्रीय” होने की चर्चा करते हैं तब उनका आशय यह होता है कि यह संघर्ष फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम आदि राष्ट्र-राज्यों की सीमा के अन्दर होता है. बुर्जुआ वर्ग को पराजित करने के लिए आवश्यक है कि सर्वहारा इस संघर्ष में अन्य देशों के सर्वहारा को मित्र के रूप में लामबंद करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ दे. लेकिन ऐसा करने के पहले उसे अपने देश के बुर्जुआ से निपटना पड़ता है. दूसरा इंटरनेशनल इसलिए असफल हो गया क्योंकि इसके नेताओं ने ‘पितृभूमि की रक्षा’ के नारे को अपना लिया था जिसके तहत शुरुआत तो विदेशी बुर्जुआ को नष्ट करने से होनी थी लेकिन इसमें न केवल सीमा पार के सर्वहारा बंधुओं बल्कि अपने सह-राष्ट्रीय सर्वहारा बंधुओं को अपनी तरफ करना ज़रूरी था. भीषणतम गृहयुद्धों में, क्रांति की अवधि में, राष्ट्रों के बीच अत्यधिक धर्मांध संघर्षों में, यहाँ तक कि इतिहास की पूरी अवधि में, इतना अधिक खून नहीं बहा है, इतनी अधिक जानें नहीं गयी हैं जितना कि हाल के विश्वयुद्ध में खून बहा है और जानें गयी हैं. ठीक उन्हीं लोगों ने इस विश्वयुद्ध का समर्थन किया था जिन्होंने अपने देश में बुर्जुआ सत्ता को बलात उखाड़ फेंकने से इस भय से इंकार कर दिया था कि इससे रक्तपात हो सकता है.
“विकास के दौरान मेहनतकश वर्ग पुराने बुर्जुआ समाज के स्थान पर एक ऐसा समाज स्थापित करेगा जिसमें वर्गों और वर्ग विरोध का लोप हो जायेगा. चूँकि राजनीतिक सत्ता बुर्जुआ समाज में विद्यमान विरोधों की आधिकारिक अभिव्यक्ति होती है, मात्र इसलिए सामान्य अर्थों में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होगी. उस वक्त तक सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच शत्रुता तो भिन्न वर्गों के संघर्ष के रूप में लेकिन बनी रहती है. जब यह संघर्ष अपने चर्म पर पहुँचता है तो क्रांति में तब्दील हो जाता है. क्या हमें यह जानकर आर्श्चय होना चाहिए कि वर्ग शत्रुता पर आधारित समाज का अंत सशस्त्र भिडंत से होगा और आमने-सामने की लडाई से इसका विघटन होगा? यह दावा नहीं किया जा सकता कि सामाजिक आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन का निषेध करता है. अभी तक कोई ऐसा राजनीतिक आन्दोलन नहीं हुआ जो सामाजिक आन्दोलन न रहा हो, जो सामाजिक आन्दोलन के साथ न चलता हो. केवल ऐसी सामाजिक अवस्था में, जिसमें वर्गों और वर्ग शत्रुता का अस्तित्व ही नहीं होगा, समाजिक विकास क्रांति का रूप धारण करना बंद कर देगा. लेकिन तब तक, हर बार जब समाज में व्यापक कायापलट होने वाली होती है, तब सामाजिक विज्ञान का निष्कर्ष जॉर्ज सान्द (1804-1876) के शब्दों में यह होगा — युद्ध या मौत : खूनी संघर्ष या विनाश, यही है वह विकल्प जिससे बचा नहीं जा सकता.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137-138)
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श्रंखला उपयोगी है। बहुत कुछ जानने को मिल रहा है।