पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में और उसके बाद भारत में एक ऐसा वर्ग पनपा है जिसे प्रो.एल.पी.जी. वर्ग के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी में इसका विस्तार है Pro. Liberalization, Privatization और Globalisation. इसके प्रबुद्ध नागरिकों में प्रोफेसर, इंजिनियर, डॉक्टर, विज्ञानी, जज,वकील , सिविल सर्वेन्ट्स वगैरा-वगैरा शामिल हैं. देश-दुनिया की समस्यायों पर यह वर्ग भी अपने फ़िक्र का इजहार करता रहता है जैसे बिजली ठप होने से आम आदमी परेशान, ट्रेफिक से आम आदमी परेशान, प्रदुषण से आम आदमी परेशान, पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम आदमी परेशान, पुलिस की ज्यादतियों से आम आदमी परेशान, कानून-व्यवस्था से आम आदमी परेशान वगैरा-वगैरा. लेकिन यहाँ आम आदमी से अभिप्राय इस प्रो.एल.पी.जी. वर्ग से सम्बंधित लोगों से ही होता है. इनकी पसंदीदा नीतियों के कारण देश की 84 करोड़ आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, उनका इन आम आदमियों के फ़िक्र की लिस्ट में कहीं कोई जिक्र नहीं होता. साफ और सीधे शब्दों में कहे तो इनकी नज़र में यह 84 करोड़ की आबादी ‘आम आदमी’ नहीं है.
अभी-अभी संपन्न हुए देश की महापंचायत के चुनावों से पहले इस वर्ग के प्रबुद्ध लोग प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलिविज़न पर अपने इस ‘आम आदमी’ के इस महापंचायत के चुनावों प्रति उपेक्षा से फिक्रमंद पाए गए. उनका मानना था कि देश की मिडल क्लास का अधिकांश वोट डालने नहीं जाता है. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ आबादी बड़े जोश-खरोश के साथ इन चुनावों में भाग लेती है. या यूँ कहें कि यह इलेक्शन इस 84 करोड़ आबादी की महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति तो करता है लेकिन मिडल क्लास के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है. तो इसके प्रबुद्ध नागरिकों का फिक्रमंद होना लाजिमी था. देश को योग द्वारा स्वस्थ करने का बीडा उठाने वाले बाबा रामदेव भी इनके फ़िक्र में शामिल हो गए. उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि इस लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोट डालना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी या मूलभूत कर्तव्य बना देना चाहिए. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ की वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है या इन चुनावों में भाग लेती है.
अब हम मान कर चलते हैं कि 84 करोड़ वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है लेकिन मिडल या अपर मिडल क्लास का बोट डालने प्रति रवैया नकारात्मक है. इसकी पड़ताल होनी चाहिए. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बुर्जुआजी इस देश के हर कोने में अपनी पैठ जमा चुकी है. कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के हर कस्बे, हर गाँव में प्रभावशाली हो चुकी इस बुर्जुआजी के लोगों के असर के अधीन इस 84 करोड़ आबादी के लोग अपना वोट डालने के लिए बाध्य हों? क्योंकि कस्बों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी देश के मजदूर वर्ग को अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए प्रभावशाली लोगों के सामने गिडगिडाना पड़ता है. भारत एक ऐसा देश है जहाँ श्रम-शक्ति सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और मजदूरों को इसे बेचने के लिए आपस में होड़ करनी पड़ती है. इसका नतीजा यह होता है कि मजदूर को श्रम-शक्ति के खरीददार से मधुर सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं. श्रम-शक्ति का खरीददार इस बुर्जुआ राज्य का एक प्रतिनिधि भी होता है. इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह श्रम-शक्ति के मालिक यानि मजदूर को न केवल वोट डालने के लिए बाध्य करे बल्कि अपनी इच्छा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए बाध्य करे.
जहाँ तक मिडल या अपर मिडल क्लास के वोट न डालने का प्रश्न है तो इसके राज की कुंजी भी उपरोक्त तथ्य में छुपी हुई है. देश की पूंजीवादी प्रणाली द्वारा मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष का एक भाग इनके यहाँ सुनिश्चित रूप से पहुँचता रहता है. यह क्लास उतनी बाध्य नहीं हो सकती जितना कि मजदूर वर्ग.
अगर आपको उपरोक्त आकलन मनोगत लगता हो तो ज़रूरी है कि आप एक प्रश्नावली बनाएँ और अपने आस-पास के सौ-पचास मजदूर लोगों से प्रश्न करें. पूरी उम्मीद है कि नतीजा वही निकलेगा जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है. उपरोक्त आकलन उन बुद्धिजीवियों के लिए चुनौती के रूप पेश किया गया है जो 84 करोड़ की आबादी के इलेक्शन में भाग लेने पर गदगद है.
अब हम उस बुद्धिजीवी को लेते हैं जो इस Liberalization, Privatization और Globalisation को संशय की दृष्टि से देखता है. इसे वामपंथी बुद्धिजीवी कह सकते हैं. हालाँकि इस विपर्यय के दौर में उसकी स्थिति अल्पसंख्यक की ही है लेकिन फ़िक्र इस तथ्य से नहीं कि वह अल्पसंख्यक है फ़िक्र उसकी अकर्मण्यता से है. इन्हें अपनी अकर्मण्यता से छुटकारा पाना होगा. इन्हें तो लाज़मी एक प्रश्नावली बनानी चाहिए और इस बुर्जुआ लोकतंत्र की सार्थकता की पड़ताल करनी चाहिए. बुद्धिजीवियों के इस वर्ग के लिए माओ त्से तुङ के इन विचारों की आज भी पूरी सार्थकता है,
“चूँकि बुद्धिजीवियों का काम मजदूर-किसान जनसमुदाय की सेवा करना है, इसलिए, सर्वप्रथम और सर्वोपरि तौर पर, उन्हें उनको (यानी मजदूर-किसानों को – अनु.) जानना होगा तथा उनके जीवन, काम और विचारों से परिचित होना होगा. हम जनता के बीच जाने के लिए , कारखानों में और गांवों में जाने के लिए, बुद्धिजीवियों को प्रोत्साहित करते हैं. यदि आप अपने पूरे जीवन में एक मजदूर या किसान से कभी नहीं मिलते, तो यह बहुत बुरी बात है. हमारे सरकारी कर्मियों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों और वैज्ञानिक शोधकर्मियों को मजदूरों और किसानों के निकट जाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाना चाहिए. कुछ लोग महज नज़र दौड़ने के लिए कारखानों और गांवों में जा सकते हैं; “इसे घोडे की पीठ पर बैठे-बैठे फूलों को देखना” कहा जा सकता है और इसका कोई फायदा नहीं हो सकता. दूसरे लोग वहां कुछ महीने रुक सकते हैं, जाँच-पड़ताल कर सकते हैं और दोस्त बना सकते हैं; इसे “फूलों को देखने के लिए (घोडे से -अनु.) नीचे उतरना” कहा जा सकता है. कुछ और दूसरे लोग वहाँ रुक सकते हैं और पर्याप्त समय तक, जैसे कि दो या तीन वर्षों तक या उससे भी अधिक समय तक वहां रह सकते हैं; इसे “बस जाना” कहा जा सकता है. कुछ बुद्धिजीवी मजदूरों और किसानों के बीच रहते हैं , जैसे कि, कारखानों में औद्योगिक तकनीशियन तथा देहातों में कृषि-तकनीशियन और ग्रामीण स्कूल शिक्षक. उन्हें अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए और मजदूरों और किसानों के साथ घुलमिल जाना चाहिए. हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें, “मजदूरों और किसानों का करीबी बन जाना” दरअसल एक आदत में ढल जाये, दूसरे शब्दों में, हमारे पास ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों की एक भारी संख्या होनी चाहिए. सभी तो नहीं लेकिन निश्चय ही, कुछ ऐसे हैं जो एक या दूसरे कारण से (मजदूरों-किसानों के बीच-अनु.) जा पाने में असमर्थ हैं, लेकिन हमें आशा है कि अधिक से अधिक जितने लोगों का जा पाना संभव होगा, वे जायेंगे. वे सभी एक ही समय नहीं जा सकते, लेकिन वे अलग-अलग समयों में टोलियों में जा सकते हैं. पुराने दिनों में जब हम लोग येनान में थे, बुद्धिजीवियों को सक्षम बनाया गया था कि वे मजदूरों और किसानों से सीधे संपर्क बना सकें. येनान में बहुतेरे ऐसे थे जिनकी सोच बहुत उलझी हुई थी और वे तमाम किस्म की अनोखी दलीलों के साथ सामने आते थे. हमारा एक फोरम था, जो उन्हें जनता के बीच जाने के लिए राय-परामर्श देता था. बाद में बहुतेरे गए, और नतीजा बहुत अच्छा रहा. एक बुद्धिजीवी का किताबी ज्ञान जब तक व्यवहार के साथ एकीकृत नहीं हो जाता, तब तक वह पूरा नहीं होता, बल्कि वह बहुत अधिक अधूरा भी हो सकता है. मुख्यत: पुस्तकों को पढने के ज़रिए ही बुद्धिजीवी हमारे पूर्वजों के अनुभवों को अर्जित करते हैं. निश्चय ही, पुस्तकें पढना ज़रूरी है; लेकिन यह अपने आप समस्याएं हल नहीं कर सकता. वास्तविक परिस्थिति का अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव और ठोस सामग्री का परीक्षण, तथा मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना ज़रूरी है. मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना आसान काम नहीं है. अभी भी जब लोग कारखानों और गांवों में जा रहे हैं, कुछ मामलों में नतीजे अच्छे हैं लेकिन कुछ में नहीं हैं. यहाँ जो चीज निहित है वह है रुख या अवस्थिति का सवाल, यानी, व्यक्ति-विशेष के विश्व-दृष्टिकोण का सवाल. हम “सैंकडों विचार-सरणियों को परस्पर संघर्ष करने देने” की हिमायत करते हैं और जानने-सीखने की हर शाखा में बहुतेरी सरणियाँ और प्रवृत्तियां हो सकती हैं; लेकिन विश्व दृष्टिकोण के मामले में आज बुनियादी तौर पर सिर्फ दो सरणियाँ हैं, सर्वहारा और बुर्जुआ. इसमें से एक हो सकता है या दूसरा, या तो सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण या फिर बुर्जुआ विश्व-दृष्टिकोण. कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण किसी भी अन्य वर्ग का नहीं बल्कि सिर्फ सर्वहारा का विश्व-दृष्टिकोण है. हमारे आज के बुद्धिजीवियों में से अधिकांश पुराने समाज से और गैर-कामगार लोगों के परिवारों से आते हैं. जो मजदूरों या किसानों के परिवारों से आते हैं, वे भी अभी बुर्जुआ बुद्धिजीवी ही हैं क्योंकि मुक्ति से पहले जो शिक्षा उन्होंने हासिल की थी वह बुर्जुआ शिक्षा थी और उनका विश्व-दृष्टिकोण मूलत: बुर्जुआ था. यदि वे पुराने विश्व-दृष्टिकोण, अवस्थिति और भावनाओं में मजदूरों और किसानों से अलग बने रहेंगे, और वे गोल छेदों में चौकोर खूंटियों के समान होंगे, और मजदूर और किसान उनके सामने अपना दिल नहीं खोलेंगे. यदि बुद्धिजीवी खुद को मजदूरों और किसानों के साथ एकीकृत कर लें और उनके बीच दोस्ती बना लें तो जो मार्क्सवाद उन्होंने किताबों में पढ़ रखा है, वह सही मायने में अपना हो सकता है. मार्क्सवाद पर वास्तविक पकड बनाने के लिए, सिर्फ किताबों से ही नहीं, बल्कि मुख्यत: वर्ग-संघर्ष के ज़रिए, व्यावहारिक कार्य और मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए सीखना होगा. कुछ मार्क्सवादी किताबें पढने के साथ ही जब हमारे बुद्धिजीवी मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए और अपने खुद के व्यावहारिक कार्य के ज़रिए कुछ समझदारी हासिल कर लेंगे तो हम सभी एक ही भाषा, न केवल देशभक्ति की सामान्य भाषा और समाजवादी व्यवस्था की सामान्य भाषा बोलने लगेंगे बल्कि शायद कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण की सामान्य भाषा भी बोलने लगेंगे. यदि ऐसा हो जाता है तो हम सभी निश्चय ही बेहतर काम करेंगे.” (दर्शन विषयक सम्बन्धी पॉँच निबंध, पृ.114-16, बिगुल पुस्तिका श्रृंखला से)
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यह पूरी तरह सही है। किताबी ज्ञान व्यक्ति को दंभी बना देता है। वह गणित के सूत्रों की तरह ही सिद्धानों को रट लेता है और उन्हें समय समय पर दोहराता रहता है। जब तक बुद्धिजीवी श्रमिकों और श्रम के साथ बहुत दिनों तक नहीं रहता वह अंतर्विरोधों की सचाई नहीं जान सकता। इतना ही नहीं उन का श्रमिकों के संघर्ष में साथ बने रहना भी आवश्यक है। केवल तभी वे यथार्थ को समझ सकते हैं। वास्तव में शिक्षा और संघर्ष साथ चलते हैं।
शुरूआत के व्यंग्यों में मज़ा भी आया…
और बाद की गंभीरता में रस भी…समझ भी…
बेहतर