श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के आलेख उद्यम और श्रम की इन टिप्पणियों को देखें ;
अभिषेक ओझा said… “लाल झण्डा माने अकार्यकुशलता पर प्रीमियम’: लाख टके की बात ! “
सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said… “जहाँ उद्यम उद्यमी और उद्योग का अर्थ श्रम का शोषण, शोषकपूँजीपति और पूँजी का विस्तारवाद, संस्कृत का श्लोक बुर्जुआओ की दलाल ब्राह्मणवादी मानसिकता समझा जाए तो व्याप्त औद्योगिक दुर्द्शा पर व्यक्त आपकी चिन्ता पर मरणासन्न मार्क्सवाद की ऎसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही है।
तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि कारवाँ लुटा क्यूँ कि तर्ज पर यह जवाबदेही बनती है कि भारत में २लाख से ज्यादा औद्योगिक इकाइयाँ बंद क्यों हैं? एशिया का मैनचेस्टर के नाम से जाना जानें वाला और जो १९४७ के पहले २ लाख तथा १९७० में लगभग १० लाख कामगारों को रोजगार देता था, वह कानपुर आज तबाह क्यों है? टैफ्को, लालइमली, एल्गिन, म्योर, अथर्टन, कानपुर टेक्सटाइल, रेल वैगन फैक्ट्री, जे०के०रेयन, जे०के०काटन, जे०के०जूट, स्वदेशी काटन,मिश्रा होजरी, ब्रशवेयर कारपोरेशन, मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स, गैंजेस फ्लोर मिल्स, न्यूकानपुर फ्लोर मिल्स, गणेश फ्लोर एण्ड वेजिटेबिल आयल मिल, श्रीराम महादेव फ्लोर मिल, एच ए एल, इण्डियन फर्टिलाइजर तथा अन्य सैकड़ों छोटे-बड़े कारखाने बन्द क्यों और किसकी वजह से हैं। सिर्फ और सिर्फ लाल झण्ड़े के कारण।”
काजल कुमार Kajal Kumar said… “आज लाल झंडे का मतलब केवल अधिकार रह गया है, न कि उत्तरदायित्व. “
dhiru singh {धीरू सिंह} said… “मजदूर यूनियन तो स्पीड ब्रेकर है तरक्की उन्हें खलती है और हड़ताल उनकी आमदनी का जरिए है”
Amit said… “यूनियन श्रमिकों को संगठित करने और कुटिल उद्योगपतियों के द्वारा श्रमिकों का शोषण रोकने के लिए बनाई गई थीं लेकिन वहाँ भी वैसी ही कुटिल राजनीति होने लगी जैसी लोकतंत्रों में होती है। श्रमिक अपना विवेक बेच के यूनियन लीडरों के पीछे भेड़ों की भांति चलने लगे और लीडर स्वयं बादशाह बन गए।”
Mired Mirage said… “The conclusion I have reached is that neither the union, nor the owners care a damn for you.They all have vested interests. Labour or whatever, you are just pawns in this great game of chess….”
उपरोक्त कुछ टिप्पणियों से जो निष्कर्ष निकलते हैं :
१. मजदूर यूनियनों की अर्थवादी रोटियां सकने कि राजनीति और
२. श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द के कारण हड़ताल, तालाबंदी या किसी औद्योगिक इकाई द्वारा पूर्ण रूप से उत्पादन बंद.
पहला निष्कर्ष भी एक विस्तृत वाद-विवाद की मांग करता है लेकिन हम यहाँ केवल दूसरे निष्कर्ष जिसमें किसी औद्योगिक संयंत्र में काम बंद होने के पीछे “श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द” को दोषी ठहराया जाता है तक सीमित रहेंगे.
अनुभववादी या मनोगत तरीके से सोचने पर स्थिति के वस्तुगत निष्कर्ष सतही और अवैज्ञानिक होते हैं क्योंकि किसी एक संयंत्र में तालाबंदी आदि के पीछे हम केवल स्थानीय कारणों तक सीमित रह जाते हैं जबकि आज की इस उत्पादन की प्रक्रिया को स्थानीय, एकांगी और आंशिक रूप से न समझकर इसे विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों की समग्रता में देखना होगा. आज के नवउदारवादी युग में कोई भी ऐसा उत्पादन नहीं है जो साम्राज्यवादी पूंजी से निरपेक्ष हो.
थोडा सा सैद्धांतिक कारणों को समझने की कोशिश करते हैं,
पूंजी के दो भाग होते हैं. स्थिर (constant) पूंजी और परिवर्ती (variable) पूंजी. कच्चा माल, सहायक सामग्री और श्रम के औजार स्थिर पूंजी में शामिल होते हैं. उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान इनके मूल्य का कुछ भाग नए उत्पाद में रूपांतरित हो जाता है लेकिन इससे मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती.
दूसरी ओर, उत्पादन की प्रक्रिया में पूंजी के उस भाग के मूल्य में अवश्य परिवर्तन हो जाता है, जिसका प्रतिनिधित्व श्रम शक्ति करता है. वह खुद अपने मूल्य के समतुल्य का पुनरुत्पादन भी करता है और साथ ही उससे अधिक बेशी मूल्य भी पैदा कर देता है. इसे परिवर्ती पूंजी कहते हैं.
प्रतिस्पर्द्धा के चलते पूंजीपति के लिए ज़रूरी होता है कि वह स्थिर पूंजी वाले भाग पर नई से नई तकनीक का प्रयोग करते हुए और परिवर्ती पूंजी पर मजदूरों की संख्या में कटौती करके श्रम सघनता बढाकर अधिक से अधिक उत्पादन करे. इससे अतिरिक्त मूल्य की दर बढ़ जाती या यूं कहें कि मजदूरों के शोषण की दर में बढोत्तरी होती है. इस मामले में बड़ा पूंजीपति छोटे के मुकाबले में अधिक लाभ में रहता है. इस होड़ में प्राय: छोटा पूंजीपति दम तोड़ देता है और उसकी औद्योगिक इकाई बंद हो जाती है. इसका एक परिणाम बेरोजगारी में वृद्धि होता है जो बड़े पूंजीपति द्वारा मजदूरों की संख्या में कटौती और बंद होने वाली औद्योगिक इकाई के कारण होती है.
इसके अलावा औद्योगिक इकाईयों के बंद होने के पीछे जो दूसरा सैद्धांतिक तर्क सक्रीय है, उसे भी समझने की कोशिश करते हैं;
‘आयरन हील’ में मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य की सरल व्याख्या करते हुए अर्नेस्ट निम्न निष्कर्ष निकालता है और प्रश्न करता है;
‘ मैं अपनी बात संक्षेप में दोहरा दूं. हमने एक विशेष औद्योगिक प्रक्रिया से बात शुरू की थी. एक जूता फैक्ट्री से हमने पाया कि जो हाल वहां है वही सारे औद्योगिक जगत में हैं. हमने पाया कि मजदूर को उत्पादन का एक हिस्सा मिलता है जिसे वह पूरी तरह खर्च कर देता है और पूंजीपति पूरा खर्च नहीं कर पाता. बचे हुए अतिरिक्त धन के लिए विदेशी बाज़ार अनिवार्य है. इस निवेश से वह देश भी अतिरिक्त पैदा करने में सक्षम हो जायेगा. जब एक दिन सभी इस स्थिति में पहुँच जायेंगे तो अंतत: इस अतिरिक्त का क्या होगा?
इसी अतिरिक्त ने वित्तीय साम्राज्यवादी पूंजी का रूप धारण करना शुरू किया लेकिन बीसवीं शताब्दी के शुरू में जब यह नावल प्रकाशित हुआ था उस वक्त वित्तीय पूंजी जो गैर उत्पादन कार्यों में लगती है , विश्व अर्थव्यवस्था की कुल पूंजी में उत्पादन की पूंजी के मुकाबले सतह पर तैरते एक बुलबुले समान थी. लेकिन आज स्थिति एकदम उल्ट है. आज वित्तीय पूंजी के मुकाबले उत्पादन कार्यों में लगी पूंजी एक बुलबुले समान है. जब इस अतिरिक्त के लिए उत्पादन कार्यों में लगने की कोई जगह नहीं है तो “किसी स्थानीय कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग की पूंजी” का मुकाबले में खड़े होना किस तरह से एक आसन कार्य हो सकता है ?
किसी स्थानीय कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग द्वारा जब उत्पादन शुरू होता है तो श्रम और पूंजी की टक्कर इस प्रक्रिया की एक आन्तरिक ज़रूरी शर्त होती है न कि बाहर से पैदा किया गया कोई छूत का रोग. खैर, उत्पादन शुरू हो जाता है, वस्तुओं के मूल्य का निर्धारण मार्केट ने तय करना होता है जिसे अन्य औद्योगिक इकाईयों की वस्तुओं के मूल्य से टक्कर लेनी होती है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इस “कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग” का खड़े रहना असंभव नहीं तो इतना आसान और जोखिम रहित नहीं होता. निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि किसी भी संयंत्र में उत्पादन कार्य के ठप होने के पीछे ” श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द” की अपेक्षा स्वयं पूंजी की आन्तरिक विसंगति कहीं ज्यादा जिम्मेदार होती है.
बीसवीं शताब्दी के शुरू में इसी अतिरिक्त ने, जिसके लिए उत्पादन के कार्यों के लिए कोई जगह बाकी नहीं बची रह गयी थी - इसी अतिरिक्त ने वित्तीय पूंजी का रूप धारण करना शुरू किया जिसका चरित्र गैर-उत्पादन कार्यों में लगना होता है. वित्तीय पूंजी साम्राज्यवाद का एक ज़रूरी लक्ष्ण है. इसी अतिरिक्त मूल्य में लगातार बढोत्तरी का परिणाम था कि साम्राज्यवादी पूंजी विश्व का पुन: बटवारा करे जिसका परिणाम बीसवीं शताब्दी के दो विश्व-युद्ध थे. अपने अतिरिक्त को खपाने का एक बढ़िया तरीका होता है कि मानवता को युद्ध में झोंक दिया जाये. इससे न केवल बेरोजगारी कम होती है बल्कि विरोधी देशों को जीतकर, वहां अपनी डमी सरकार की स्थापना द्वारा अपने हितों कि पूर्ति जारी रखी जा सकती है.
आज भले ही समाजवाद हार चुका हो लेकिन पूंजी का चरित्र किसी भी प्रकार से विकासोंमुखी नहीं है. पूंजी स्वयं परजीवी होती है जो मजदूर द्वारा पैदा किये गए अतिरिक्त से अपना विस्तार करती है. लेकिन आज तो पूंजी का एक भाग जो वित्तीय है जो उत्पादन की किसी भी प्रक्रिया में नहीं है, जो अपने विस्तार के लिए उस पूंजी से हिस्सा छीनता है जो स्वयं मजदूर से निचोडे गए अतिरिक्त पर निर्भर होती है – पूंजी का यह चरित्र किसी तरह से भी मानव हितैषी नहीं है. बीसवीं शताब्दी की यह भी एक विडम्बना ही थी कि एक तरफ समाजवाद हार गया और दूसरी तरफ पूंजीवाद की समस्याओं में लगातार बढोत्तरी हो रही थी.
उत्पादन की शक्तियों का बेहद विस्तार हो चुका है लेकिन उत्पादन सम्बन्ध वही पुराने हैं. इस आलेख के शुरू में दी गयी टिप्पणियों में वर्णित फ़िक्र और सुझाव ठीक वैसे ही हैं जैसे पैर के बढ़ने पर जूता बदलने की बजाय पैर को काटना. उत्पादन की शक्तियां जब विकसित हो जाती हैं तो वे पुराने आर्थिक संबंधों को तोड़ डालती हैं. मानव जाति का अब तक का विकास इसी बात की पुष्टि करता है. उत्पादन की शक्तियों के विकास पर माओ के इस कथन –“औजार मनुष्यों द्वारा निर्मित किए जाते हैं | जब औजार क्रांति की माँग करते हैं , वे मनुष्यों के अंदर से बोलते हैं” का महत्त्व कम नहीं हुआ है. भले ही समाजवाद अपने पहले प्रयोग में हार चुका हो लेकिन मानव जाति ने अगर आगे बढ़ना है तो यही एक रास्ता है.
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अच्छा आलेख। बहुत सी चीजों को समझने में मदद मिली।
” पूंजी की आन्तरिक विसंगति कहीं ज्यादा जिम्मेदार होती है.” यह पूंजी की आंतरिक विसंगति कुछ स्पष्ट नहीं हुई। वह क्या है?
बेहतर…
ये समझ को विकसित करने के लिए भी जरूरी है, और किसी भी विषय पर चलताऊ तरीके से दृष्टि डा़लने की प्रवृति को स्थगित कर उस पर पहले थोडा जानकारी पाने की प्रवृति को बढ़ावा दिए जाने की पहलकदमी भी…
और शायद इससे कहीं ना कहीं सामाजिक चेतना में कुछ हलचल तो होती ही है…
प्रतिस्पर्द्धा के चलते पूंजीपति के लिए ज़रूरी होता है कि वह स्थिर पूंजी वाले भाग पर नई से नई तकनीक का प्रयोग करते हुए और परिवर्ती पूंजी पर मजदूरों की संख्या में कटौती करके श्रम सघनता बढाकर अधिक से अधिक उत्पादन करे. इससे अतिरिक्त मूल्य की दर बढ़ जाती या यूं कहें कि मजदूरों के शोषण की दर में बढोत्तरी होती है…..
इससे होता यह है की उत्पादित मूल्य में श्रम का भाग घटने से उसकी क्रय शक्ति और घट जाती है जिससे पूंजीपति को माल बेचने में कठिनाई आती है.
‘बेशी मूल्य का पूंजी में रूपांतरण’ नामक अध्याय में मार्क्स लिखते हैं;
“यद्यपि उद्योग की सभी शाखाओं में स्थिर पूंजी के उस भाग के लिए, जिसमें श्रम के औजार शामिल होते हैं, यह आवश्यक होता है कि वह मजदूरों की एक खास संख्या के लिए (जो व्यवसाय विशेष के आकार से निर्धारित होता है) पर्याप्त हो, फिर भी इसका सदा यह अर्थ कदापि नहीं होता की वह उसी अनुपात में बढ़ता जायेगा, जिस अनुपात में मजदूरों की संख्या में वृद्धि होती चली जायेगी. मान लीजिए कि किसी फैक्टरी में १०० मजदूर ८ घंटे रोजाना काम करके काम के ८०० घंटे देते हैं. यदि पूंजीपति इस राशिः को ड्योढा कर देना चाहता है, तो वह पचास मजदूर और रख सकता है. परंतु तब उसको न सिर्फ मजदूरी की मद में, बल्कि श्रम के औजारों की मद में भी कुछ नयी पूंजी लगानी पड़ेगी. लेकिन यह भी मुमकिन है कि १०० मजदूरों से ८ घंटे की बजाय १२ घंटे रोजाना काम लेने लगे. तब श्रम के जो औजार पहले से ही मौजूद थे, वे ही काफी होंगे. अंतर केवल यह होगा कि वे पहले से ज्यादा तेजी के साथ खर्च हो जायेंगे. इस प्रकार श्रम-शक्ति के पहले से अधिक तनाव से उत्पन्न अधिक श्रम से अधिक बेशी उत्पाद और अधिक बेशी मूल्य का उत्पादन हो सकता है. (अर्थात संचय की विषय-वस्तु में वृद्धि हो सकती है ) , पर उसके लिए पूंजी के स्थिर भाग में तदनुरूप वृद्धि न करनी पड़े”.