एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार
(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)
कात्यायनी, सत्यम
दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!
दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बिना सांस्कृतिक मोर्चे पर सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं होगा। दलित-मुक्ति के प्रश्न की उपेक्षा करके सर्वहारा क्रान्ति या जन-मुक्ति की परियोजना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। सहशताब्दियों से सर्वाधिक व्यवस्थित और सर्वाधिक बर्बर शोषण-दमन के शिकार दलित देश की कुल आबादी में लगभग तीस प्रतिशत हैं और उनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल हैं। यह आबादी यदि सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतंत्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति को स्वीकार नहीं करेगी तो उसकी विजय असम्भव है। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न भी असमाधानित ही बना रहेगा (क्योंकि पूँजीवादी दायरे के भीतर सुधार की सम्भावनाएँ अब समाप्तप्राय हैं) तथा समाजवादी क्रान्ति को लगातार चलाए बिना समाज को उस मुकाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति और धर्म के आधार पर किसी भी तरह का अन्तर बचा ही नहीं रह जाएगा।
इस प्रश्न की द्वन्द्वात्मक समझ की कमी के अभाव में अतीत में कम्युनिस्ट आन्दोलन और वाम जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन में वर्ग-अपचयनवाद (class-reductionism) का विचलन गम्भीर रूप में मौजूद था। आज इसी विचलन का दूसरा छोर वर्ग-विसर्जनवाद (class-liquidationism) या वर्ग-निषेधवाद के रूप में मौजूद है जब इस हद तक के फतवे दिए जा रहे हैं कि वर्ग-विश्लेषण की क्लासिकी मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय जाति-व्यवस्था का विश्लेषण ही सम्भव नहीं है। दलित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के “दलितवादी” चिन्तन के प्रति निहायत अनालोचनात्मक, आत्मसमर्पणकारी, समन्वयवादी रवैया अपनाया जा रहा है। यह एक घातक विसर्जनवादी, सुधारवादी प्रवृत्ति है जिसका आज खूब बोलबाला है। आज हिन्दी में जो दलित-लेखन हो रहा है, वह पक्षधर साहित्य है, प्रतिरोध का साहित्य है, रैडिकल आलोचनात्मक यथार्थवादी साहित्य है। लेकिन यह सच है कि यह सम्पूर्ण दलित आबादी के बजाय, मुख्यत: उस मध्यवर्गीय दलित का प्रातिनिधिक स्वर है, जिसका आर्थिक प्रश्न तो एक हद तक हल हो चुका है और अब सामाजिक अपमान व भेदभाव ही जिसके लिए केन्द्रीय प्रश्न है। इसीलिए समकालीन दलित लेखन का तेवर चाहे जितना तीखा हो, वह ठोस विकल्प के रूप में इसी व्यवस्था के भीतर कुछ सुधारों की माँग करता है, दलित-प्रश्न की समूल समाप्ति की कोई परियोजना नहीं प्रस्तुत करता तथा क्रान्ति के नाम से बिदकता है। यह अनायास नहीं कि जिन आन्दोलनों-संघर्षों में दलित आबादी की बहुतायत होती है या जो आन्दोलन गाँवों में दलित उत्पीड़न के ही किसी मुद्दे पर होते हैं उनसे यह दलित `भद्रलोक´ कोसों दूर रहता है। दलित साहित्य चूँकि अम्बेडकरवाद को ही अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त मानता है, अत: दलित अस्मिता की पहचान और उनके प्रतिरोध-आन्दोलन को संगठित करने में डा. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह ज़रूरी है कि उनके विचारों की विस्तृत, तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचना की जाए। प्रश्न यह है कि अम्बेडकर की दार्शनिक विश्वदृष्टि क्या थी? उनके मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचार क्या थे? दलित हितों के अर्जन और हिफाजित के अन्तरिम प्रावधानों और प्रतिरोध आन्दोलन के प्रोग्राम के साथ ही क्या डा. अम्बेडकर के पास दलित-प्रश्न के सम्पूर्ण और अन्तिम समाधान की कोई दूरगामी सांगोपांग परियोजना थी? ब्राह्मणवाद और जाति प्रश्न का `एक्सपोज़र´, विश्लेषण और भर्त्सना ज़रूरी है, लेकिन लगातार, लम्बे समय तक यहीं रुके रहना और इसे ही दलित आन्दोलन का पूरा प्रोग्राम बना देना कहाँ तक उचित है?
हम समझते हैं कि सामाजिक बदलाव एक वैज्ञानिक प्रश्न है और विज्ञान के प्रश्न निस्संकोच, बेलागलपेट बहस की माँग करते हैं। दलित-प्रश्न को लेकर मार्क्सवाद पर अधूरेपन का लेबल मात्र लगाने के बजाय इस पर मुद्देवार, विस्तृत बहस होनी चाहिए, अम्बेडकर के विचारों और दलित आन्दोलन के इतिहास पर भी बहस होनी चाहिए तथा दलित प्रश्न के वर्ग-विश्लेषण के साथ-साथ समकालीन दलित साहित्य को भी विश्लेषण के एजेण्डे पर लाया जाना चाहिए। तर्क-विचारहीन दलित-हित समर्थन का शोरगुल आज दलित प्रश्न पर सही कार्यदिशा अपनाने में गम्भीर विघ्न पैदा कर रहा है।
स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!
समाजशास्त्रीय विमर्श की ही भाँति कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज बुर्जुआ नारीवाद के विविध नये-नये रूपों और किस्मों का खूब बोलबाला है। नववामपन्थी “मुक्त चिन्तक” स्त्री-प्रश्न पर क्लासिकी मार्क्सवाद के “अधूरेपन” और “यांत्रिकता” को स्वीकारते हुए बुर्जुआ नारीवादियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं।
एक गहरे वैचारिक कुचक्र के तहत सर्वहारा क्रान्ति और पार्टी-सिद्धान्त को पुरुष स्वामित्ववाद और स्त्री-उत्पीड़न के तत्त्वों से युक्त बताया जा रहा है और स्त्री-आन्दोलन की स्वायत्तता की वकालत करते हुए आधी आबादी को जन-मुक्ति-संघर्ष की ऐतिहासिक परियोजना से काटकर अलग करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बुर्जुआ नारीवाद की सभी किस्में उन उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका `स्वर्ग´ इसी व्यवस्था में सुरक्षित है। वे पुरुष-वर्चस्ववाद का विरोध तो करना चाहती हैं, लेकिन इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना में जमी उसकी जड़ों को नहीं देख पातीं क्योंकि इस व्यवस्था के वर्ग-उत्पीड़क चरित्र से उन्हें कोई शिकायत नहीं। एन.जी.ओ. प्रायोजित नारीवादियों का एक हिस्सा स्त्रियों, दलितों, विस्थापितों के उत्पीड़न और पर्यावरण के प्रश्न पर अलग-अलग जनसंघर्षों की हिमायत करता है लेकिन इन सबको एक ही मुक्ति-परियोजना के अभिन्न अंगों के रूप में नहीं देखता और विचारधारा और राजनीति के प्राधिकार को स्वीकार नहीं करता। यह अराजकतावाद और संघाधिपत्यवाद (syndicalism) का ही एक नया रूप है। भारत में तीव्र पूँजीवादीकरण से हुए मध्यवर्ग के विस्तार और बुर्जुआ संस्कृति के आच्छादनकारी प्रभाव ने बुर्जुआ नारीवाद के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। सर्वहारा क्रान्तियों की विफलता से पैदा हुए परिवेश और बुर्जुआ वैचारिक-सांस्कृतिक प्रचार के प्रभाव में, निम्न-मध्यवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों का एक बहुत बड़ा रैडिकल हिस्सा भी व्यापक मेहनतकश आबादी और आम मेहनतकश स्त्रियों के संघर्षों से जुड़ने के बजाय फिलहाल बुर्जुआ नारीवादी लहर के साथ बह रहा है। साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में जारी स्त्री-विमर्श में पुरुष-वर्चस्ववाद के प्रश्न को एक समाज-निरपेक्ष, स्वायत्त प्रश्न के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। स्त्री-मुक्ति के किसी व्यावहारिक सुदीर्घ कार्यक्रम के बिना सिर्फ़ गर्मागर्म लफ्फजी का अविराम सिलसिला जारी है। रचनात्मक लेखन का भी परिदृश्य हूबहू ऐसा ही है।
इस बेहद ज़रूरी और बुनियादी सवाल पर पुरज़ोर हस्तक्षेप की ज़रूरत है। नारीवादी विचारों और नारीवादी रचनाओं की सुव्यवस्थित आलोचना और मीमांसा प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मार्क्सवाद स्त्री-प्रश्न को हल करने का कोई मॉडल या बना-बनाया फार्मूला नहीं प्रस्तुत करता बल्कि स्त्री की पराधीनता के इतिहास और आधारभूत कारणों की पड़ताल करता है तथा वर्गों के उन्मूलन की सुदीर्घ ऐतिहासिक परियोजना के एक अंग के तौर पर स्त्री-उत्पीड़न की समाप्ति की भी तर्कसम्मत सोच उसी प्रकार प्रस्तुत करता है जिस प्रकार मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के हर रूप के उन्मूलन की भविष्यवाणी करता है। आम स्त्रियों के बीच यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी के प्रारम्भ-बिन्दु से ही स्त्री-प्रश्न उसके एजेण्डे पर अनिवार्यत: उपस्थित रहेगा, लेकिन स्त्री-पुरुष असमानता के भौतिक-ऐतिहासिक आधारों के नष्ट होने के बाद भी यौन-भेद और पुरुष-वर्चस्व की सहशताब्दियों पुरानी संस्कृति समाज में एक लम्बे समय तक मौजूद रहेगी और सतत् सांस्कृतिक क्रान्तियों की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही उसका निर्मूलन सम्भव हो सकेगा। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्त्री-मुक्ति की तमाम बुर्जुआ नारीवादी अवधारणाएँ इस प्रश्न के सम्पूर्ण हल की कोई दिशा नहीं बतलातीं, क्योंकि वे खुशहाल मध्यवर्गीय स्त्रियों से नीचे की स्त्रियों को सम्बोधित नहीं होतीं। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर, स्त्री-प्रश्न पर प्रस्तुत की जाने वाली वर्ग-अपचयनवादी अवस्थिति की भी प्रखर आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।
भारत में यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक अनिवार्यत: आधारभूत कार्यभार है कि व्यापक जनसमुदाय के बीच अन्धविश्वास, धार्मिक कुरीतियों, मध्ययुगीन निरंकुशता, नई बुर्जुआ निरंकुशता और धार्मिक मूलतत्त्ववादी फासीवादी विचारों से निरन्तर सिंचित-पोषित स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्व के तमाम रूपों के विरुद्ध एक रैडिकल सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आन्दोलन की उद्वेलनकारी लहर पैदा की जाए। इसके बाद ही सामाजिक-राजनीतिक सरगर्मियों में आधी आबादी की पहलकदमी और भागीदारी बढ़ाने के प्रयास सार्थक और प्रभावी हो सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा के राजनीतिक और सांस्कृतिक हरावल अपने निजी आचरण-व्यवहार से यह सिद्ध करें कि वे दोहरे-दुरंगे लोग नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के सच्चे-सक्रिय पक्षधर हैं। समाज और व्यावहारिक स्थितियों की दुहाई देकर, निजी और पारिवारिक जीवन में पुरुष-वर्चस्ववादी आचरण करने वाले (जैसे घरेलू गुलामी को प्रश्रय देने वाले, दहेज व जाति-धर्म आधारित विवाहों को स्वीकार करने वाले, स्त्री-विरोधी सामाजिक आचारों को व्यावहारिकता की दुहाई देकर स्वीकारने वाले, अपने परिवार में प्रेम-विवाह जैसी चीज़ों का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करने वाले, आदि-आदि) पाखण्डी-कायर-धूर्त मध्यवर्गीय प्रगतिशीलों और संशोधनवादी कम्युनिस्टों ने स्त्री-समुदाय को सर्वहारा क्रान्ति के प्रवाह से काटकर अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अत: इस प्रश्न पर सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हमें अपने निजी जीवन और आचरण से करनी होगी।
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