एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार
(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)
कात्यायनी, सत्यम
आज ऐसे ही कथित वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिक कर्मियों का बोलबाला है जो “मुक्त लोग” हैं। राजनीति पर खुली-दो टूक चर्चा से वे बिदकते-कतराते हैं। किसी भी तरह का अनुशासन उन्हें अपनी “सर्जनात्मकता” के हाथों की हथकड़ी प्रतीत होती है। वे अकेले अपने दम-बूते जनता और इतिहास की “सेवा” करते हैं। वास्तव में यह मध्यवर्गीय अराजकतावाद है, व्यक्तिवाद और फिलिस्टाइनवाद है। सामूहिक शक्ति और सर्जना का अनुशासित योग भौतिक उत्पादन के लिए ज़रूरी है और आत्मिक उत्पादन के लिए भी। इस बात का विरोध करने वाले समष्टिगत सर्जना के भविष्य और उत्पादक श्रमजीवी के प्रतिनिधि लेखक नहीं हो सकते। हम बेझिझक, बल देकर यह कहना चाहते हैं कि यह स्थापना आज भी पूरी तरह सही है कि सर्वहारा वर्ग का कला-साहित्य समूचे सर्वहारा क्रान्तिकारी कार्य का एक अंग है। जैसाकि लेनिन ने कहा था, यह समूची क्रान्तिकारी मशीनरी के दाँते और पेंच के समान है। “कला और साहित्य राजनीति के मातहत होते हैं, लेकिन वे खुद भी राजनीति पर अपना महान प्रभाव डालते हैं। क्रान्तिकारी कला और साहित्य समूचे क्रान्तिकारी कार्य का एक अंग हैं, ये दोनों इस कार्य के दाँते और पेंच हैं, तथा ये कुछ अन्य अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण पुर्जों की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण और कम आवश्यक भले हीं हों, मगर समूची मशीनरी के अनिवार्य दाँते और पेंच हैं तथा समूचे क्रान्तिकारी कार्य के अनिवार्य अंग हैं।” – (माओ त्से-तुङ : येनान कला-साहित्य गोष्ठी में भाषण)
हम इसे अपरिहार्य समझते हैं, इसलिए अधिकांश प्रगतिशील सुजान-सर्जकों के लिए उबाऊ-बिदकाऊ बात होते हुए भी इस “पुरानी स्थापना” को दुहराना चाहते हैं कि संस्कृति के मोर्चे को राजनीतिक धरातल के वर्ग-संघर्ष से जोड़ना होगा और सांस्कृतिक सृजन और प्रचार के काम को पूरे क्रान्तिकारी उपक्रम का अनिवार्य अंग बनाना होगा। कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उदारतावाद के विरुद्ध संघर्ष आज बेहद ज़रूरी है।
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