
डॉन में छपी रिपोर्ट के अनुसार प्रख्यात ग़ज़ल गायिका इकबाल बानो मंगल को चल बसीं. उस्ताद चाँद खान की शिष्या इकबाल बानो 1935 में दिल्ली में पैदा हुईं. 1952 में वे पाकिस्तान चली गयीं जहाँ उन्होंने रेडियो पाकिस्तान से अपने कैरियर की शुरुआत की. उसी वर्ष 17 साल की उम्र में उन्होंने एक भूस्वामी से इस शर्त पर शादी की कि वह उनके गायन कार्य में सहायक होगा. 1957 में, लाहौर आर्ट काउन्सिल में उनका प्रथम गायन कंसर्ट हुआ.
बेशक उन्हें ग़ज़ल गायिका और विशेषतया फैज़ अहमद ‘फैज़’ की गज़लों की गायिका के तौर पर अधिक जाना जाता है लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की फिल्मों गुमनाम (1954), कातिल (1955). इन्तेकाम (1955), सरफरोश (1956), इश्के-लैला (1957) और नागिन (1959) में पार्श्व गायिका के रूप में भी अपना स्वर दिया.
1974 में उन्हें तमगा-ए- इमतियाज़ से नवाजा गया.
प्रसिद्व पाकिस्तानी कवि ‘फैज़’ जिनकी रचनाओं को उन्होंने बड़े उत्साह से गाया,की सपुत्री सलीमा हाश्मी कहती हैं,”इकबाल बानो हमारे परिवार के दिलों और दिमागों में विशेष स्थान बनाये रखेंगी.”
1985 में जब तानाशाह जिया उल हक़ द्वारा फैज़ के क्रांतिकारी काव्य के गायन की मूक मनाही थी, को याद करते हुए हाश्मी कहती हैं ” उनकी प्रेरणा और समर्थन हमारे सबसे महान वसीलों में से एक हो गुज़रे जब उन्होंने अपने अति-उत्साहित श्रोताओं में “हम भी देखेंगे” गाने की जुरअत की. मुझे अब भी याद है कि किस तरह आवेशित श्रोतागण अपनी फरमाईशों को दोहरा रहे थे”. तत्पश्चात यही गीत उनके लिए ‘राष्ट्रीय गीत’ बन गया जिसे वह अपने प्रशंसको के लिए सदैव गाती रहती थीं.
“वास्तव में, यह बानो ही थीं जिन्होंने 1981 में पहली बार ‘फैज़’ के काव्य का गायन शुरू किया“, ऐसा मानना है हाश्मी का.
उपरोक्त फ्लैश प्लेयर आईकोन से उनकी यह ग़ज़ल सुने जिसका टेक्सट टूटी हुई बिखरी हुई से साभार लिया गया है.
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्मो-सितम के कोहे-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहले -हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
हम देखेंगे
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी
उट्ठेगा अनल – हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
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गायिका इकबाल बानो को श्रृद्धांजलि.