विश्वव्यापी आर्थिक संकट पूंजीवाद की लाइलाज बीमारी का एक लक्षण है ! इसका हल पूंजीवाद के खात्मे के साथ ही होगा…

‘बिगुल’ अक्टूबर २००८ से साभार

पूरी दुनिया के चौधरी मिलकर विश्व पूंजीवादी व्यवस्था की जड़े हिलाकर रख देने वाले आर्थिक संकट का कोई हल नहीं निकाल पा रहे हैं. हर दिन यह संकट गहरा और व्यापक होता जा रहा है. कुछ ही दिन पहले तक पूंजीवाद की बढ़ती ताकत और मजबूती का जो मिथक खड़ा किया जा रहा था वह रातोंरात ध्वस्त हो चुका है. कहा जा रहा है कि यह 1930 की महामंदी जैसा संकट है. लेकिन अर्थशास्त्री कीन्स के सुझाए नुस्खे भी इस बूढे, जर्जर पूंजीवाद को इस संकट से उबरने में कोई मदद नहीं कर पा रहे है. संकट टालने के लिए वह जो कुछ भी करता है उससे संकट और भी गहरा होता जा रहा है.

वैसे तो मंदी का दुश्चक्र पूंजीवादी व्यवस्था को पिछले तीन दशकों से घेरे हुए है लेकिन मौजूदा आर्थिक संकट की शुरुआत अमेरिका में सबप्राइम संकट के साथ करीब तीन वर्ष पहले हो गई थी. संकट टालने की तमाम कोशिशों के बावजूद पिछले महीने सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओं में से दो के दिवालिया हो जाने के साथ ही जबर्दस्त विस्फोट के रूप में संकट फट पड़ा. उसके बाद शुरू हुई भयंकर मंदी और शेयर बाजारों में गिरावट और आर्थिक ध्वंस के सिलसिले ने पूरी दुनिया के बड़े पूंजीवादी देशों को अपनी चपेट में ले लिया है.

हालात इतनी बुरी है कि दिवालिया होने से बचने के लिए अमेरिका सरकार द्वारा बीमार कंपनियों को दिए गए 700 अरब डालर के पैकेज का भी कुछ असर होता नहीं दिख रहा. ब्रिटेन सीधे बैंकों को 500 अरब पौंड (लगभग 800 अरब डालर) दे रहा है ताकि वे बाज़ार में पूँजी झोंककर अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाएं. अब इसी तर्ज़ पर अमेरिका भी सीधे बैंकों को कई सौ अरब ओर देने वाला है. अब तक अमेरिका सरकार करीब एक हजार अरब डालर कंपनियों को बचाने के लिए दे चुकी है. रूस अपनी कंपनियों को 150 अरब डालर दे चुका है. तमाम यूरोपीय देश मिलकर अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए सैंकडों अरब यूरो खर्च करने की योजनाएं बना रहे हैं.

अमेरिका तो पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश था लेकिन अब तो उस पर लदा क़र्ज़ सवा दस खरब डालर से भी ज्यादा हो चुका है. हर अमेरिकी नागरिक पर इस समय 34000 डालर क़र्ज़ लदा हुआ है. क़र्ज़ कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है इसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि पल-पल बढ़ते क़र्ज़ का आंकडा दर्शाने वाली राष्ट्रिय ऋण घड़ी के अंकों की संख्या कम पड़ गई है और अब 15 अंकों वाली दूसरी घड़ी लगाने की तैयारी की जा रही है.

दरअसल इस संकट की जड़े पूंजीवाद के ढांचागत संकट में हैं. आज विश्व अर्थव्यवस्था का केवल 10 प्रतिशत ही  वास्तविक उत्पादक गतिविधियों में लगा हुआ है और 90 प्रतिशत पूँजी वित्तीय क्षेत्र और अनुत्पादक गतिविधियों में लगी हुई है. स्थिति यह है कि विश्वस्तर पर वास्तविक अर्थव्यवस्था में मंदी और ठहराव का संकट मौजूद रहा है. गुब्बारे की तरह फूलता हुआ एक विराट वित्तीय तंत्र पैदा हुआ है जिसमें बीच-बीच में तेज़ी दिखाई देती है लेकिन थोड़े ही समय में वह फ़िर किसी संकट का शिकार हो जाती है. वर्तमान भीषण संकट की शुरुआत तो 2001 में डॉट-कॉम कंपनियों का दिवाला पीटने के समय से ही हो गई थी. उसके बाद अमेरिकी सरकार ने ब्याज दरों को गिराकर और बाज़ार में पूँजी झोंककर आवासीय मकानों के बाज़ार में उछाल पैदा किया. लेकिन 2005 में यह बुलबुला भी फूट गया और उसके बाद जो सबप्राइम संकट शुरू हुआ उससे बचाने के लिए अमेरिका के संघीय बैंक ने यह कहकर बाज़ार में पूँजी झोंकने से इंकार कर दिया था कि हर ऐसी मदद के बाद जो नया संकट आता है वह पहले से भी ज्यादा भयंकर होता है. पूँजीवादी व्यवस्था के संकटमोचाकों की बदहवासी का यह आलम है कि सब कुछ जानते हुए आज फ़िर वही काम कर रहे हैं. सच तो यह है कि उनके पास और कोई रास्ता भी नहीं रह गया है. सामने मुहं फैलाए संकट को टालने के लिए वे और भी घातक संकट को जन्म देने वाले काम कर रहे हैं और उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा है कि संकट की और बड़ी लहर जब पलटकर आयेगी तो वे क्या करेंगे.

भारत सरकार और उसके वित्तमंत्री लगातार दावे कर रहे हैं कि भारतीय व्यवस्था की हालत दरुस्त है और वैश्विक मंदी से उसे कोई खतरा नहीं है. एक दिन पहले वे सबको आश्वस्त करने के बयान देते हैं और अगले ही दिन अमेरिका की अपनी यात्रा रद्द करके भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने की कसरत में जुट जाते हैं. भारतीय उद्योग जगत लाखों अरब रूपए की पूँजी बाज़ार में झोकने की मांग कर रहा है. चिदंबरम महोदय के पास भी इसके अलावा कोई और नुस्खा नहीं है.

आज जनता से टैक्सों के जरिए वसूले गए अरबों रूपए पूंजीपतियों को बचाने के लिए बाज़ार में झोंक रही सरकारों से कोई पूछे की जब आप राष्ट्रियकरण और सब्सिडी का विरोध कर रहे थे तब आप के ये तर्क कहाँ थे ? विश्व बैंक और आइएमएफ से लेकर तमाम पूंजीवादी संस्थाएं और अर्थशास्त्री यह चीख-पुकार मचाये हुए थे कि सरकार को अर्थव्यवस्था में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए और सब कुछ बाज़ार की शक्तियों पर छोड़ देना चाहिए. शिक्षा और स्वास्थ्य तक में सरकार को टांग नहीं अडानी चाहिए. निजिकरण के पक्ष में नए-नए आक्रामक तर्क दिए जाते थे. आज ये सब पूरी बेशर्मी से कंपनियों को सैंकडों अरब डालर की सरकारी मदद देने का समर्थन कर रहे हैं और कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए. यानि अगर जनता को बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए उससे ही उगाहा गया पैसा खर्च किया जाए तो वह “संसाधनों की बर्बादी” है लेकिन जब मुनाफाखोरों पूंजीपतियों का दिवाला पीटने लगे और वे सरकारी मदद के लिए गुहार लगाएं तो ऐसा करना “राष्ट्र” की खुशहाली के लिए जरूरी कदम हो जाता है.

मार्क्स ने डेढ़ सदी पहले ही बता दिया था कि आर्थिक संकट और मंदी पूंजीवाद की लाइलाज बीमारियाँ हैं और ये उसके साथ ही ख़त्म होंगी. बस इनका रूप बदलता रहेगा. लाख कोशिशों के बाद भी पूंजीवाद के तमाम वैद्य-हकीम इसकी लाइलाज बिमारियों का कोई भी हल नहीं सूझा सके हैं.

इस विश्वव्यापी आर्थिक संकट के नतीजे सिर्फ़ आर्थिक क्षेत्र में ही नहीं होंगे. साम्राज्यवादी देशों की आपसी होड़ पर इसका असर पड़ेगा और तय है कि अमेरिकी चौधराहट और भी कमजोर हो जायेगी. लगातार खस्ताहाल अर्थव्यवस्था, इराक और अफगानिस्तान में फंसे होने से बढ़ता भयानक सैन्य खर्च पहले ही अमेरिका की हालत पतली किए हुए थे, लेकिन इस संकट की मार तो उसे बिल्कुल जर्जर कर जायेगी.

हर पूंजीवादी संकट की तरह इस संकट की अन्तिम मार तो मेहनतकश और गरीब आबादी पर ही पड़ेगी. शेयर बाज़ार की सट्टेबाजी में अपना सबकुछ लुटाकर परिवार सहित आत्महत्या करने वाले अमेरिका के कार्तिक राजाराम जैसे तो कुछ होंगे. शार्टकट में पैसा कमाने के लिए सट्टेबाजी के जरिए बिना कुछ किए पैसे से पैसे बनाने वाले इनके जैसे लोग पूँजीपतियों को मेहनतकशों की हड्डियाँ निचोड़ने का मौका देते हैं. शेयर में लगाए गए उनके पैसे से पूंजीपति मशीनीकरण और ऑटोमेशन को तेज़ करके काम-सघनता को बढाते हैं और इस प्रकार मजदूरों को पहले से भी ज्यादा निचोडते हैं. मध्यवर्ग में ऐसे लोगों को अपने लालच की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है. लेकिन वैश्विक मंदी की सबसे बुरी मार दुनिया भर की करोडों मेहनतकश आबादी पर पड़ेगी. छंटनी, बेरोजगारी, महंगाई की मार उसे ही झेलनी होगी. पूंजीपतियों को दी गई सरकारी सहायता की कीमत भी बढे हुए टैक्सों के जरिए जनता को ही चुकानी पड़ेगी. अपनी तबाही-बदहाली के खिलाफ आवाज उठाने पर गरीबों का दमन-उत्पीडन भी तेज़ होगा.

लेकिन यह भी सच है कि तमाम संकटों के बाबजूद पूंजीवाद का राक्षस ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं मरेगा. अगर दुनियाभर में क्रांतिकारी शक्तियां कमजोर रहेंगी तो पूंजीवाद गिरते-पड़ते, घिसटते हुए चलता रहेगा. पर इतना तय है कि यह संकट दैत्य के दुर्ग में एक नया तूफान पैदा करेगा. नेतृत्वकारी कमजोर होंगी तो संघर्ष शुरू में अराजक और स्वत:स्फूर्त होंगे. लेकिन एक बार उन्हें सही दिशा मिल गई तो पूंजीवादी संकट इस चिंगारी के लिए बारूद का काम करेगा.


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  1. सुसंगत वैज्ञानिक विवेचना। परन्तु प्रगतिकामी शक्तियों के संगठित/सशक्त न
    हो पाने की स्थिति में परिस्थितियां फ़ासीवाद की ओर भी मुड़ सकती हैं।


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