शायरी मैंने ईजाद की –अफजाल अहमद

काग़ज़ मराकशियों ने ईजाद किया

हरूफ फिनिशियों ने

शायरी मैंने ईजाद की

कब्र खोदने वाले ने तंदूर ईजाद किया

तंदूर पर कब्ज़ा करने वालों ने रोटी की पर्ची बनाई

रोटी लेने वाले ने कतार ईजाद की

और मिलकर गाना  सीखा


रोटी की कतार में जब चींटियाँ आ गई

तो फाका ईजाद हुआ


शहतूत बेचने वालों ने रेशम का कीड़ा ईजाद किया

शायरी ने रेशम से लड़कियों के लिबास बनाये

रेशम में मलबूस लड़कियों के लिए कुटनियों ने महलसरा ईजाद की

जहाँ जाकर उन्होंने रेशम के कीड़े का पता बता दिया


फासले ने घोडे के चार पाँव ईजाद किए

तेज़ रफ्तारी ने रथ बनाया

और जब शिकस्त ईजाद हुई

तो मुझे तेज़ रफ्तार रथ के आगे लिटा दिया गया


मगर उस वक़्त तक शायरी ईजाद हो चुकी थी

मुहब्बत ने दिल ईजाद किया

दिल ने खेमा और कश्तियाँ बनाई

और दूर-दराज मकामात तय किए


ख्वाज़ासरा ने मछली पकड़ने का कांटा ईजाद किया

और सोये हुए दिल में चुभोकर भाग गया

दिल में चुभे हुए कांटे की डोर थामने के लिए

नीलामी ईजाद की

और

ज़बर ने आखरी बोली ईजाद की


मैंने सारी शायरी बेचकर आग खरीदी

और ज़बर का हाथ ज़ला दिया

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मराकिशी–मोरक्को के मिराकिश शहर निवासी
फीनिशी–फीनिश के निवासी
महलसरा–अन्त:पुर, हरम
खेमा–तम्बू
ख्वाज़ासरा– हरम का रखवाला हिंज़डा
ज़बर–अत्याचार

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